एकांकी
तामक तमघैल
पात्र
परिचए...
पुरुष पात्र-
१.
रविन्द्र ४५ बर्ख
२.
चन्द्रदेव ४५ बर्ख
३.
सुनलाल ३५ बर्ख
स्त्रीपात्र-
१.
रागिनी ६५ बर्ख
२.
बलाटवाली ६० बर्ख
३.
पीपरावाली २५ बर्ख
४.
अनुराधा ४५ बर्ख
४.
४.
पहिल दृश्य-
(जेठ
मास। एगारह बजैत। जेठुआ दृश्य।)
पीपरावाली : (माथपर छिट्टामे पुरना पार्ट-पुर्जा साइकिलक नेने)
लोहा-लक्कर बेचै जाइ- जाएब ई.. य..अ..अ..ऐ...?
(रागिनी
आ बलाटवाली घरक ओसारपर बैसल गप-सप्प करैत। कवाड़िनक अावाज सुनि..)
रागिनी : कनी लोहा-लक्करवालीकेँ एम्हरे अबैले कहियौ।
(ओछाइनपर
सँ उठि बलाटवाली आगू बढ़ि..)
बलाटवाली : हइ पीपरावाली, कनी एम्हरे आबह।
(माथपर
छिट्टा नेने पच्चीस बर्खक पीपरावाली छपुआ साड़ी पहिरने, पएरक चप्पल फटफटबैत
अबैत..।)
पीपरावाली : काकी, कनी छिट्टा टेक देथु।
(दुनू
गोटे छिट्टा उतारि निच्चाँमे रखैत। माथ परक बीरबा निच्चाँ राखि आँचरसँ चानिपर
चुबैत पसीना पोछैत। तइबीच रागिनी भीतरसँ -घरसँ- एकटा तामक तमघैल आनि आगूमे
रखैत..)
रागिनी : कनियाँ, हमरा तँ बुझले ने छलए जे तोहूँ लोहा-लक्करक कारोबार
करै छह। नै ते....?
पीपरावाली : दादी, अपने करै छी आकि दीन करबैए?
रागिनी : सासु-ससुर आ घरबला नै छह?
पीपरावाली : सासु-ससुर तँ घिना कऽ मुइल जे घरोबला तेहने अछि।
रागिनी :
से की?
पीपरावाली : की कहबनि। पतिक खिघांस केने तँ पाप लागत। मुदा छिपौनौ तँ जिनगिये
जाएत।
(गुन-धुनमे
पीपरावाली पड़ि जाइत..)
बलाटवाली : दीदी, अही बेचारीक की सुनथिन। अपने सबहक नै देखै छथिन। हिनके
बेटा-पुतोहु छन्हि, दस-बारह बर्खसँ कम गाम एना भेल हेतनि।
रागिनी : बाहरम बर्ख छी।
बलाटवाली : हिनके की कहबनि, हमरे नै देखै छथिन जे जहियासँ घरबला मुइल
तहियासँ दुनू-बेटा-पुतोहु कोनो गरनामे रहए देने अछि। तखन तँ अपना लुरिये-बुधिये
जीबै छी।
(रागिनी
आ बलाटवालीक बात सुनि पीपरावाली..)
पीपरावाली : दादी, ई बड़का छथि। हम कहुना भेलौं तँ हिनकर धिये-पूते भेलियनि।
धिया-पूता जे माए-बाप लग झुठ बाजे सेहो नीक नै।
बलाटवाली : माइये-बाप किअए कहै छहक, लोककेँ झुठ बजबे नै करक चाही।
पीपरावाली : काकी, कहलथि तँ बेस बात, मुदा हम सभ तँ धंधा करै छी। झुठेक
खेती छी। निच्चाँ-ऊपर सगतरि एक्के रंग।
रागिनी : बलाटवाली, जहिना अहाँ भरि दिन खुरपीसँ घास छिलै छी तहिना
जे गपोकेँ छिलबै तँ उ घास जकाँ उखड़त की आरो असुआएल लोक जकाँ छिड़िया कऽ पसरि
जाएत।
बलाटवाली : हँ, तँ आगू की कहए लगलहक हइ पीपरावाली?
पीपरावाली : घरबला दे कहए लगलियनि। की कहबनि काकी, बजैत लाज होइए। जहिना बुढ़बा -ससुर- तड़िपीबा रहए तहिना बेटो छै? (कहि चुप
भऽ पुन: आँचरसँ चानि पोछए लगैत..)
रागिनी : कमाइ-खटाइ नै छह?
पीपरावाली : से जे कमैते तँ एहिना रौदमे वौऐतौं। बापकेँ तँ खेत-पथार रहै
बेचि-बिकीन के पीलक। आब तँ ने खेत पथार अछि आ ने कमाइबला।
रागिनी : बच्चा कअएटा छह?
पीपरावाली : दू भाए-बहिन अछि। जेठका छओ बर्खक आ छोटकी चारि बर्खक।
रागिनी : अपने जे भौरी करए चलि जाइ छह तँ बेटा-बेटीकेँ बाप देखै छै कि
ने?
पीपरावाली : की देखतै जनिपिट्टा। भरि दिन पीब कऽ अड़-दड़ बजैत रहैए। जहाँ
किछ बाजब की सोहाइ लाठी लगा दइए।
बलाटवाली : तोहूँ किअए ने उनटा दइ छहक?
पीपरावाली : धुर काकी, इहो सएह कहै छथि। कुल-खनदान की पुरखेटा बँचबैए आकि
जनीजातियो। हमरा जे कतबो देह धुनत तँ ओकरा दोख नै लगतै मुदा हम जे उनटा देबै तँ
कुल-खनदानक नाक कटतै आकि नै?
रागिनी : भरि दिनमे कत्ते कमा लै छहक?
पीपरावाली : दादी, कमाइयेपर ने ठाढ़ छी। दुनू बच्चोकेँ पोसै-पालै छी आ
घरोबलाकेँ पाँच-दस रूपैया पीऐ लऽ देबे करै छिऐ ने?
बलाटवाली : एहेन छुतहर घरबला छह तँ किअए
ने छोड़ि दइ छहक?
पीपरावाली : काकी, मरलो-जड़ल अछि तँ घरेबला छी। यएह कहथु जे जे सुख घरबलासँ
होइ छै से दोसरसँ हएत।
रागिनी : आब तँ हुिस गेलह। नै जे पहिने बुझल रहितए जे गाममे तोहूँ
लोहा-लक्करक कारवार करै छह तँ तोरे दैतियह।
पीपरावाली : केकरा हाथे बेचलखिन?
रागिनी : झंझारपुरक एकटा बेपारी अबैए, ओकरे हाथे।
पीपरावाली : झंझारपुरबला बेपारी तँ गरदनि कट सभ छी।
रागिनी : से की?
पीपरावाली : अनकर की कहबनि, अपने कहै छियनि। आठ बर्ख पहिने हमर बाप खुआ
चानीक हँसुली दुरागमनमे देलक। ऐठाम दिन घटल। पाँच बर्खक पछाति जखैन वएह हँसुली
ओही वनीमा ऐठाम बेचए गेलौं तँ रूपा कहि अधिये दाम देलक।
रागिनी : छोड़ह दुनियाँ-जहानक गप। अपन बाल-बच्चा, घर-परिवारक गप करह,
जे केना ठाढ़ रहत? केकरा
कहब भल आ केकरा कहब कुभल। कोइ अपना ले करैए।
बलाटवाली : कनियाँ, नैहरोमे यहए काज करै छेलह?
पीपरावाली : (दुनू आँखि मीड़ैत..) काकी, हिनकर पएर छूबि कहै छियनि,
कहुना भेली तँ माइये-पितिआइन भेली। गाम मोन पड़ैए ते......?
बलाटवाली : चुप किअए भेलह? ऐठाम की कियो पुरुख-पातर अछि जे धखाइ छह। नैहरामे
के ने खेलाइ-धुपाइए।
पीपरावाली : धुर बुढ़िया नहितन। एक्को-पाइ बजैमे संकोच नै होइ छन्हि।
रागिनी : ओहिना बलाटवाली चौल करै छह। बाजह...?
पीपरावाली : दादी, नैहर मोन पड़ैए तँ सुमारक होइए। माए-बापक बड़ दुलारू छेलिऐ।
चारि भाँइक बीच असगरे बहिन छिऐ।
रागिनी : बिआह करै काल बाप देखा-सुनी नै केने छेलखुन?
पीपरावाली : अनकर दोख की देबै दादी। दोख अपन कपारक। जे कपारमे सटि गेल सहए
ने हएत।
रागिनी : हँ, से तँ सएह होइ छै। मुदा तैयो तँ लोक लड़का-लड़कीक मिलान
देख ने बिआह करैए।
पीपरावाली : सोझमतिया बाप ठकहरबा सबहक भाँजमे पड़ि गेल।
रागिनी : ऐठामसँ आरो आगू जेबहक की घुरि जेबहक?
पीपरावाली : भऽ गेल भरि दिनक कमाइ। बालो-बच्चा देखना बड़ी खान भऽ गेल आ
रौदो चंडाल अछि।
(तमघैल
उनटा-पुनटा कऽ देख बलाटवाली..)
बलाटवाली : आब ऐ सबहक कोनो माेल रहल दीदी। घरमे अन्न रहत तँ लोक माटियो
बरतनमे रान्हि-पका खा सकैए।
रागिनी : बड़ी खान तोरो भऽ गेलह कनियाँ। एक्केठाम बैसने काज नै चलतह।
बाजह, कते दाम देबहक?
पीपरावाली : दादी, हिनका लग झुठ नै बाजब। एक तँ कते दिनसँ कारेवार करै छी।
तहूमे एहेन तमघैल आइ पहिले दिन अभरलहेँ। आइ रखि लथु। भाओ बूझि कऽ दोसर दिन लऽ
जाएब।
रागिनी :
एकरा नेने जाह। जतेमे बिकेतह तइमे तूँ अपन बोनि निकालि दऽ दिहह।
बलाटवाली : बड़ निम्मन चीज छन्हि।
रागिनी : जहिना सासु-ससुरक बीचक जिनगी, बेटा-पुतोहुक बीच बदलि जाइ छै
तहिना अहू तमघैलकेँ भेल।
पीपरावाली : से की दादी, से की?
रागिनी : (विस्मित होइत..) की कहबह! नैहरमे जहिया देलक आ ऐठाम आएल तहिया
घरक गिरथानि भऽ रूपैया-पैसा रखैक तिजोरी बनल रहए। मुदा जखैन चोर-चहारक उपद्रव
बढ़ल तखन बुढ़हा -ससुर- झँपना दऽ ओछाइनिक तरमे गाड़ि कऽ रखै छलाह। आब तँ सहजहि
घरे ढनमना गेल तँ एकरा के पूछत।
बलाटवाली : कनियाँ, दीदीयोकेँ खगता छन्हि। ताबे नून-तेल करैले अधो-छिधो
दऽ दहुन आ लऽ जाह।
पीपरावाली : (पचास रूपैयाक नोट दैत..) दादी, ताबे एते रहए देथुन। एक
खेप गामपर सँ रखने अबै छी। एक घोंट पानियो पीब लेब।
बलाटवाली : अखैन खाइ-पीबै बेर भऽ गेल। जँ अखैन नहियो आबि हेतह तँ ओही
बेरमे, बेरू पहर लऽ जइहह।
पीपरावाली : हँ सेहो हएत। जँ आइ नै आबि हएत तँ काल्हियो लऽ जाएब।
रागिनी :
आब तोहर चीज भेलह। देखते छहक चोर-चहारक उपद्रव। तँए नीक हेतह जे साँझो पड़ैत आइये
लऽ जइहह।
पीपरावाली : बड़बढ़िया!
(())
दोसर दृश्य-
(खैर-चून मिला, रागिनी अल्मुनियम डेकचीक पेनमे लगबैत..)
रागिनी : कपार फुटने लोकक सभ किछु फुटए लगै छै आ जुटने सभ किछु जुटए
लगै छै। जखैन नूनो-तेल जोड़ैमे भीड़ पड़ैए तखन डेकची कीनब असान अछि। कत्ते दिन
चून-खैर साटि काज चलत। जखैन फुटि गेल तखन आरो बेसिये होइत जाएत की दढ़ हएत।
(बाड़िये देने झटकल बलाटवाली अबैत...)
रागिनी : किअए सिताएल नढ़िया जकाँ बाड़िये-बाड़ी
पड़ाएल एलह हेन?
बलाटवाली : (हँफैत) की कहबनि दीदी, ई की कोनो नै जनै छथिन जे जेहने
बेटा अछि तेहने पुतोहु। बीचमे हम दुश्मन।
रागिनी : की करबहक, जखैन बेटे माएकेँ नै चिन्हलक, जेकरा नअ मास पेटमे
रखलक तखन पुतोहु तँ सहजहि दोसराक बेटी छी।
बलाटवाली : कहै तँ दीदी ठीके छथिन, मुदा इएह कहथु जे ओइ घर-दुआरमे हमर किछाे
ने अछि। हम कतौसँ दहा-भसा कऽ आएल छी।
रागिनी : से के कहै छह! लोकक मतिये मरा गेल अछि। जे
माए-बाप दादा-दादी एतेटा जिनगी बिता एते देखलक ओ किछु ने आ छौड़ा-छौड़ी किछु
ने देखलक ओ बुिद्धयार भऽ गेल अछि। से नै देखै छहक।
बलाटवाली : हँ, से तँ देखै छिऐ। सभ कहैए जे जुग-जमाना बदलि गेल आ बदलल किच्छो
देखबे ने करै छिऐ तँ केना बिसवास हएत।
रागिनी : जहिना दिशांस लगने लोक पूबकेँ पछिम आ उत्तरकेँ दछिन बुझए
लगैए तहिना भऽ गेल अछि।
बलाटवाली : नै बुझलियनि?
रागिनी : जुग-जमाना बदलल नै आगू डेग बढ़ौलक हेन। बदलैक माने होइ छै
एकटाकेँ हटा दोसर आनब। से नै भेलहेँ। जँ से होइते तँ देखतहक सभ किछु आगिमे जड़ि
गेल आकि बाढ़िमे दहा गेल आ फेरसँ सभ किछु नवका भऽ गेल।
बलाटवाली : छोड़थु ऐ मगजमारी गपकेँ। अपन बात बिसरि जाएब। अनकर गप सुनने
मगज भरियेबे करै छै। जाबे अपन बात नै बुझब ताबे माथ हल्लुक केना हएत?
रागिनी : की भेलह हेन जे एते....?
बलाटवाली : िक कहबनि खेलरा-खेलरीक गप, दुनू एक्के रंग अछि। एते दिन
मौगीक गप नीक लगै छलै, आब जे हुकुम चलबए लगलै तँ बकछुहुल लगै छै।
रागिनी : तूँ तँ केहेन बढ़ियाँ जीबै छह। दुनू पहर दू पथिया घास अनै छह
आ दुनू साँझ खाइ छह। बेटा-पुतोहु जे घर दफानिये लेलकह तँ आरो जान हल्लुके केलकह कि
ने?
बलाटवाली : हँ, से तँ भेल। मुदा से देखल जाइए। जते काल बाधमे रहै छी ततबे
काल ने, जखैन अंगनामे रहै छी तखैन केना देखल जाएत।
(तही
बीच सुनरलाल ललकैत अबैए..)
सुनरलाल : दादी, ऐ बुझ़ियाकेँ पूछियौ जे किअए छिटकल घुरैए।
बलाटवाली : दीदी, ऐ छौड़बाकेँ पुछथुन जे हमरा माए बुझैए। तखन तँ अपन बनाओल
घर छी, लछमीक (गाए) सेवा करै छी वएह पार लगौती।
सुनरलाल : हम तोरा माए नै बुझलियौ आकि अपने पुतोहुकेँ कपारपर चढ़ा लेलेँ।
जे तोरा कपारपर चढलौ ओ कुदि कऽ हमरा कपारपर नै चढ़ि जाएत।
बलाटवाली : हँ रौ, चारू कातसँ हारलेँ हेँ तखैन तूँ हमरा बुझबै छेँ। आइ तक
एक्को दिन भेलौ जे माएकेँ कोनो तीरथ करा दिऐ। ई तँ धैन दीदी जे लाटमे जनकोपुर,
सिंहेसरो आ कुशेसरो देखलौं।
रागिनी : (बलाटवालीकेँ चोहटैत) तोहूँ बड़े बजै छह, अखैन तक अपन
उमेरोक ठेकान नै छह। किअए बुढ़ियापर बिगड़ल छहक बौआ?
सुनरलाल : माएपर किअए बिगड़ब। देखियौ जे हाथपर ओते पाइ नइए जे पनरहम दिन
बेटाक नाआें कोचिंगमे लिखाएब तइपर सँ कन्यादानी न्योंत सासुरसँ चलि आएल हेन?
बलाटवाली : दीदी, बात छिपा कऽ बजै छन्हि। ई दुनूटा चाहैए जे गाए बेचि भोज
खा आबी।
रागिनी : कनी फरिछा कऽ कहह?
बलाटवाली : ऐ धड़कटहाकेँ पुछथुन जे मात्रिक उसरि गेल आकि अछि। इज्जत
बँचबै दुआरे भातिज सभकेँ कहि देलिऐ जे बौआ, आब ओते चलि-फिर नै होइए जे
आएब-जाएब करब। ओहो सभ परदेशिया, गाम अबैए तँ दस-बीस रूपैइयौ आ लत्तो-कपड़ा दऽ
जाइए। एकरा पुछथुन जे एक बीत नुओ कीन कऽ दइए।
रागिनी : तोहूँ बड़ रगड़ी छह बलाटवाली। कनी फरिछा कऽ कहह बौआ?
सुनरलाल : दादी, ननौरवालीक बहिन बेटीक बेटीकेँ बिआह छी। सभटा परदेशिया
भऽ गेल। नवका-नवका विधि बेवहार सभ करैए। पुरना गामक लोक लए छोड़ि देने अछि।
रमेशक सभ संगी झंझारपुर कोचिंगमे नाअों लिखाओत, ओकरा हम नै लिखेबै से केहेन हएत?
रागिनी : ऐ काजमे के मुहछी मारतह। भगवान करथुन चारियो अक्षर जे पढ़ि
लेतह ओते नीके हेतह कि ने। अहूना लोक बजैए जे पढ़ल-लिखल हरो जोतत तँ सिरौर सोझ
हेतै। कनियाँक की विचार छन्हि?
सुनरलाल : ओ कहैए जे सबहक ठाठ-बाठ बजरूआ रहतै तइठीन जे हम जाएब से केना
जाएब। हमरा देख ओ सभ हँसत नै।
रागिनी : बौआ, जाबे असथिर मोनसँ घरक नीक-अधला नै बुझबहक ताबे एहिना
हेतह। तोरा जे कहबह से अपने नै देखै छह। बेटा-पुतोहु शरहमे खेत कीनलक हेँ। घर
बनाओत। आ हम ऐठाम नून-तेल ले मरै छी।
सुनरलाल : अखनो जे एक रती चुहचुही अछि से अही बुढ़ियापर। खेत-पथारक कोनो
लज्जति अछि। गोटे बेर बाढ़िये चलि अबैए तँ गोटे बेर रौदिये भऽ जाइए। गोटे
साल हबे तेहेन बहैए जे दने भौर भऽ जाइ छै। कीड़ी-फतीगिंक चरचे कोन।
रागिनी : बौआ, घरक पुरुख तँ तोंही ने छहक? तोंही ने गारजन भेलहक?
सुनरलाल : हँ, से तँ छिऐ मुदा कियो मोजर देत तखैन ने। ई बुढ़िया अखनो
बेदरे बुझैए तँ घरवाली की बुझत?
बलाटवाली : थुक देथुन एहेन छौंड़बाकेँ?
रागिनी : दुनियाँमे माइयक सेवा बेटाक लेल ओहन होइत जेकर जोड़ा नै छै।
तखन रंग-बिरंगक माए-बाप, बेटा-बेटी भऽ गेल अछि। तँए दुनियाँ दिस नै देख अपन ऐनामे
माएकेँ देखि हृदैमे समुचित जगह देबाक चाही।
बलाटवाली : दीदी, पैघ फड़क पैघ लत्ती होइ छै, मुदा छोटक तँ छोटे होइ छै।
रागिनी : हँ से तँ होइ छै। अच्छा बौआ, एते दूरक लत्ती केना पकड़ि
लेलकह। नैहर-सासुर धरिक लत्ती तँ ठीक छै मुदा नोनी साग जकाँ केना एते चतरि गेलह।
सुनरलाल : दादी, की कहब। ई सार मोबाइल जे ने करए। मोबाइलेपर न्योंत-पिहान,
ए.टी.एम.सँ लेन-देन तेहेन रस्ता धड़ा देलक हेन जे फुदियोसँ बेसी लोक उड़ए लगल
हेन।
रागिनी : बौआ, अनकर की कहबह, अपना पोताकेँ दस बर्ख भऽ गेल अछि, अखैन तक
एक नैन देखलौं तक नै। तखन तँ छातीमे मुक्का मारनहि छी जे जखैन बेटे नै तखन
पुतोहुए आ पोते-पोती कतए।
सुनरलाल : तखन की करी दादी?
रागिनी : बौआ, किछु जे धाँइ दऽ कहि देबह से नीक नै हएत। किअए तँ घरमे
(परिवारमे कते) कते रंगक लोक रहैए। अपना रंगे सभ देखै छै। तँए एक्के बात
एककेँ नीक लगै छै दोसरकेँ अधला। जेकरा अधला लगतै ओ तँ अधले कहत।
सुनरलाल : दादी, अहाँक बात माइयो मानैए। अहाँ जे कहब सएह करब।
रागिनी : बौआ, देखहक जखने कमाएत कोइ आ खर्च करत कोइ तखने किछु-ने-किछु
गड़बड़ हेबे करत।
सुनरलाल : तखन?
रागिनी : यएह जे परिवारकेँ सभ संस्था बूझि इमनदारीसँ जीबए।
सुनरलाल : ननौरवाली केना सुढ़िआएत?
रागिनी : बौआ, बेटा तोरे नै ननौरोवालीक छिऐक। स्कूलमे की खर्च होइ छै
से तँ तूँ बुझै छहक। मुदा माए नै बुझै छै। तँए कहक जे रमेशक नाओं स्कूल जा लिखा
दिऔ।
बलाटवाली : बेस कहलिऐ दीदी। बैसल-बैसल देह पोसैए आ बात गढ़ैए। भने कहलिऐ?
सुनरलाल : कहने थोड़े चलि जाएत। कहत जे बुझले ने अछि बौआ जाएब।
रागिनी : (मुस्कुराइत) बौआ, यएह बात सभकेँ बुझए पड़तै। सोझे कौआ
जकाँ अकासमे कुचड़ने नै ने हेतै।
बलाटवाली : दादी कहथुन ने, जे हाटपर दू सेर सीम भट्टा कीनत तँ संगे दुनू
गोरे जाएत। आ स्कूलमे जा कऽ नाओं लिखा देतै, से नै हेतै। तइकाल पाग उतरि जेतै।
रागिनी : बेस तँ कहलहक।
(())
तेसर दृश्य-
(डेराक
बरामदा। चारि कुरसी एक टेबुल। टेबुलक एक भाग रविन्द्र आ दोसर भाग अनुराधा
बैसल..)
रविन्द्र : की समए आ की सपना छल। आइ की देख रहल छी।
अनुराधा : जना बूझि पड़ैए जे कओलेजक ओ दिन मोन पड़ि रहल जइ दिन एहिना
कौमन रूममे बैस गप-सप्प करैत रहै छलौं।
रविन्द्र : हँ, सपना तँ साकार भेल जे जहिना अहाँ देख संगी बनेबाक इच्छा
भेल। मुदा एकटा कहू जे ओइ समए अहाँ की सोचैत रही। जे कओलेजसँ निकलला बाद की करब?
अनुराधा : (विस्मित होइत) सभ कर्मक खेल छी। जा धरि संगीक
बंधनमे नै बान्हल गेल छलौं ताधरि एकटा झिझड़ीदार परदा बीचमे छल, जे आब नइए।
रविन्द्र : की मतलब?
अनुराधा : मतलब यएह जे सृष्टिक एक कर्ता रूपमे अपनाकेँ पाबि रहल छी।
मुदा....?
रविन्द्र : मुदा की?
अनुराधा : अपन प्रवल इच्छा रहए जे प्रोफेसर बनि बाल-बाेधकेँ बाट देखाएब
मुदा आइ बूझि पड़ैए जे अपनो बाट अन्हराएले जा रहल अछि।
रविन्द्र : से की?
अनुराधा : यएह जे एम.ए.क डिग्री बेकार लेलौं। की जिनगी अछि? यएह ने जे भानस
करै छी अपनो खाइ छी आ अहँू सभकेँ खुआबै छी।
रविन्द्र : (मुस्की दैत) एकरा कम बुझै छिऐ?
अनुराधा : कम तँ नै छिऐ मुदा जेकरा मौनसूनक बोध नै रहत ओ जँ हथिया
नक्षत्रक बर्खा देखत, से कते काल?
रविन्द्र : गप-सप्पक ओझरी की तिआरि जालसँ कम होइए। एक बेर ओझराएत तँ
ओकरा फेकै पड़त। अच्छा, ओइ सभ गपकेँ छोड़ू अखुनका गप करू।
अनुराधा : जखैन अपन जमीन भऽ गेल तखैन अनेरे आठ हजार भाड़ाबलाकेँ किअए दइ छिऐ?
रविन्द्र : भरिसक जमीन बेचए पड़त। घर नै बना पाएब।
अनुराधा : एना निराश किअए भेल जाइ छी?
रविन्द्र : निराश केना नै हएब! ने कोनो बैंकक नोकरी करै छी जे दरमहो बेसी
आ कमीशनो भेटत आ ने प्रशासनिक सेवामे छी जइठाम ‘राम-नाम’क लूट भऽ रहल अछि।
अनुराधा : (मुड़ी डोलबैत) हँ से तँ बान्हल दरमाहा अछि। एकटा करू, किछु
टयूशने करू आकि कोनो कोचिंगे पकड़ि लिअ।
रविन्द्र : ई ने तँ बुझै छिऐ जे बर-पीपरक गाछ जकाँ मनुक्खो अछि, चालिस
टपि गेलौं। अखैन तँ चश्मे टाक जरूरति भेलहेँ, आगू तँ बाकिये अछि।
अनुराधा : तखन?
रविन्द्र : तखन की अहू तँ संगे पढ़ने छी। संगीये छी तखन आइ किअए पुछै छी।
अनुराधा : पुछब बड़ अधला भेलै। ऐ घरक चिन्ता अपने नै करब तँ कियो आन
आबि कऽ देत।
रविन्द्र : से तँ नै करत मुदा एकटा बात कहूँ जे जइ दिन दरमाहा उन-सँ-दून
भेल आ तइसँ दुनू गोटेक मोन खुशी भेल। जइ खुशीमे बजारसँ सजा कऽ अनने रही। तइ दिन
आमदनी तँ देखलिऐ मुदा खरचा देखिलिऐ। छओ महिनासँ घरक भाड़ा विवादमे पड़ल अछि।
ओ आठ हजारसँ दस हजार कऽ देलक। बेसी बात नै करब, एक्केटा बात कहू जे मोबाइलेमे कते
महिना उठैए।
अनुराधा : (गुम्म भऽ उपरो-निच्चाँ देखैत आ मूड़ियो डोलबैत..)
मूड़ियो डोलबैत।
रविन्द्र : गुम्म किअए छी। समाजक पढ़ल-लिखल लोक तँ अपने सभ छिऐ।
अनुराधा : हँ, से तँ देखै छी रंग-विरंगक खरचा बढ़ि गेल हेन। एते दिन किताबो-पत्रिका
पढ़ि-पढ़ि समए बितबै छलौं आब जे टी.बी. अछि तँ बिजलीक लाइने ने रहै छै।
रविन्द्र : अपनो मोन जना किताब दिससँ उचटले जाइए। एते दिन इच्छा रहैत
छलए जे किछु नव चीज पढ़ि विद्यार्थीकेँ पढ़ावी मुदा आब तँ रटले साॅपक मंत्र
जकाँ, बकि दइ छिऐ।
अनुराधा : (रिंग सुनि मोबाइल उठा) हेलो?
चन्द्रदेव : हँ, हँ मुम्बईसँ चन्द्रदेव बाजि रहल छी।
अनुराधा : (सुखल हँसी हँसि..) आहा हा, चन्द्रदेवबाबू?
चन्द्रदेव : हँ, हँ अनुराधा जी?
अनुराधा : हँ, हँ, हँ।
चन्द्रदेव अहींक शहर आबि गेल छी। एक घंटाक समय खाली अछि तँए सोचलौं जे मिलि-जुलि
ली। पान-सात मिनटमे डेरा पहुँचि रहल छी।
अनुराधा : अवस-अवस अबियैक। दोसो डेरेपर छथि।
चन्द्रदेव : गाड़ीमे मोबाइल गड़बड़ाइए। आगूक गप डेरेपर हेतै।
रविन्द्र : चन्द्रदेव सेठ भऽ गेल। पँच-पँचटा नोकर। अपन तीन-तीनटा गाड़ी।
अनुराधा : जेकर भाग चमकै छै तेकरा एहिना होइ छै।
रविन्द्र : कहलिऐ तँ बेस बात मुदा ई बुझे छिऐ जे एक्के कओलेजसँ निकलल
एक गोटे लाखक कमाइ करैए आ एक गोरे पाँच
हजारपर शिक्षा मित्र अछि।
अनुराधा : हँ, से तँ अछि।
(नव
मोडलक पोशाकमे चन्द्रदेवक प्रवेश..)
रविन्द्र : (दुनू हाथे बाँहि पकड़ि छाती मिलबैत..) भाय, भाय,
अहाँ तँ बड़का लोक भऽ गेलौं।
चन्द्रदेव : नै-नै भाय, मनुख कतौ रहए मुदा हृदए तँ वएह रहै छै। की अनुराधा
जी।
अनुराधा : (सरमाइत) चन्द्रदेवबाबू कतए आ अनुराधा कतए। आब ओ सभ पछिला
गप स्मृति बनि किछु मनो अछि आ बेसी बिसरिये गेलौं।
चन्द्रदेव : मुनेसरक दोकानक छोला आ कपरकट्टा दोकानक गुप-चुप।
अनुराधा : जइ दिनक जे भोग-पारस छल भेल। आइ जे अछि से भऽ रहल अछि।
चन्द्रदेव : भाय, अपन घर छिअह आकि भाड़ाबला?
रविन्द्र : (मलिन होइत..) भाय, एते दिन अशो छल मुदा....?
चन्द्रदेव : मुदा की?
रविन्द्र : अर्थक जालमे ओझरा गेल छी। गुन अछि जे बेसी धिया-पूता नै अछि।
चन्द्रदेव : परिवार नियोजन करा लेलह?
रविन्द्र : हँ, मुदा दुइयोटा केँ पाड़ लागब कठिन बूझि पड़ि रहल अछि।
चन्द्रदेव : भाय, जते भारी जिनगीकेँ बुझै छहक ओते भारी कहाँ अछि। अपनासँ
बेसी वाइफ कमाइए।
अनुराधा : ओहो नोकरी करै छथि?
चन्द्रदेव : नै। लाइसेंस करा कऽ अपन एकटा ब्रांच खोलने छी। पचाससँ उपरे
एजेंट काज कऽ रहल अछि।
अनुराधा : पैघ लोकक पैघ बात।
रविन्द्र : हमरो कोनो विचार दाए तँ.....?
चन्द्रदेव : गाममे की कम सम्पत्ति छह। बेचि कऽ लऽ आनह। कहबे केलह जे दू
कट्टा जमीन कीनने छी। निच्चा-ऊपर मकान बना लएह। तते भाड़ा हेतह जे घरक काज अनेरे
हराएल रहतह।
रविन्द्र : भाय, तेना ने तोरा देख हेरा गेलौं जे चाहो-पान पछुआ गेल।
(अनुराधा
भीतर जाइत..)
चन्द्रदेव : जखैनसँ गाड़ीसँ उतरलौं तखैनसँ बूझि पड़ैए जे गरमे देह झड़कैए।
रविन्द्र : की कहबह ऐठामक पानि-बिजलीबला सबहक किरदानी।
चन्द्रदेव : से की?
रविन्द्र : देखते छहक जे एते गरमी अछि बिजलीक कतौ पता नै।
(पािन-चाह
आनि अनुराधा टेबुलपर रखैत। तीनू गोटे तीनू दिस बैस, पानि पीब चाह पीबैत..)
अनुराधा : चन्द्रदेवबाबू, कते दिनसँ अपनो मोनमे नचै छलए जे गामक
खेत-पथार बेच, एतै बेवस्था कऽ ली मुदा अपने दुविधामे पड़ल छथि।
चन्द्रदेव : से की?
रविन्द्र : माए गाममे अछि। जँ हम बेचए चाहब आ ओ नै बेचए दिअए तखन की
करब। माए बेटामे झगड़ा करब?
अनुराधा : हक-हिस्सा ले तँ लोक बापोसँ झगड़ा करैए आ अहाँ माइयेक गप करै
छी।
रविन्द्र : बापसँ झगड़ा करब नीक मुदा माएसँ....?
(())
चारिम दृश्य-
(रागिनीक
पुरान घर। बरसातक झमारल..)
रविन्द्र : माए, छुट्टी नइए। बरह-बजिया गाड़ीसँ चलि जाएब।
रागिनी : एते धड़फराएल किअए छह। एते दिनपर एलह, तखन एते किअए अगुताएल
छह। कम-सँ-कम, जहिना कोटमे जते मासक एस्काउन्ट रहल तते दिन कस्टडीमे राखि
जमानत भऽ जाइ छै तहिना कम-सँ-कम, दसो दिन तँ रहह।
रविन्द्र : अखैन बहुत कड़ाइ कौलेजमे चलि रहल अछि। एते दिन तँ नहियो
गेने काज चलि जाइ छलए। आब तँ विद्यार्थी आबह कि नै आबह मुदा प्रोफेसरकेँ जाएब
अनिवार्य भऽ गेल अछि।
रागिनी : माल-जालकेँ लोक बान्हि कऽ रखैए, मनुखकेँ कियो थोड़े बान्हि
कऽ राखि सकैए।
अनुराधा : माए, हमसब िकमहर एलियनि से तँ पुछबे ने केलथि?
रागिनी : अपनो घरमे लोककेँ एहन बात पुछल जाइ छै जे तोरा सभकेँ पुछबह।
अनुराधा : काजे आएल छी।
रागिनी : केहेन काज, बाजह?
अनुराधा : से तँ बेटा सोझेमे छन्हि, पुछि लेथुन।
रागिनी : से की बौआ नै सुनैए जे पुछबै। बाजत तँ वएह ने। बिना बजने
थोड़े बुझब।
रविन्द्र : माए, पाँच बर्ख जमीन कीनना भऽ गेल। सोचने रही जे ऐ साल जमीन
कीन लै छी आ अगिला साल घर बना लेब। से गरेपर ने चढ़ैए।
रागिनी : से तँ अपने बुझबहक? जे की सोचलौं आ की होइए। हम स्त्रीगण जाति की
बुझबै जे घर केना बनाओल जाइए। इहो (अपन घर देखबैत..) तँ अपने (पति) बनाओल छियनि
जे कष्टो काटि कऽ आसरा अछि।
रविन्द्र : माए, जहिना अरामसँ कमाइ छी तहिना अरामे सँ खरचो भऽ जाइए।
रागिनी : से की?
रविन्द्र : कोनो की एक रंगक खर्च अछि। जहिना उन-सँ-दून दरमाहा बढ़ल तहिना
ने खरचो उन-सँ-दुन भऽ गेल अछि। कतबो बचा कऽ रखए चाही छी, कहाँ बचि पबैए।
रागिनी : खैर, छोड़ह ऐ सभ गपकेँ। की कहलह जे काजे...?
रविन्द्र : दुनू प्राणी विचारलौं हेन जे गामक चीज-बौस बेचि कऽ घर बना
लेब। अनेरे जे एते भाड़ा भरै छी से तँ नै भरए पड़त।
रागिनी : ऐठामक जे चीज-बैस बेचि लेबह तँ हम कतए रहब?
अनुराधा : किअए, हिनका रहैले घर नै छन्हि। बेटा कियो वीरान छियनि।
रागिनी : से के वीरान कहत। मुदा.....?
अनुराधा : मुदा की?
रागिनी : मनुख दू जिनगी जीबैए। एक बेटा-बेटीक दोसर माए-बापक। जाबे
सासु-ससुर जीबै छलाह, ताबे बेटी जकाँ रहलौं। मुदा ई तँ दुनियाँक खेले छी जे सभ सब
दिन नै रहत। जहाँ धरि बनि पड़ल तहाँ धरि एक्को दिन सासुक मुँहे अवाच् कथा नै
सुनलौं।
अनुराधा : की कहै छथिन से नै बूझि रहलयनि हेन?
रागिनी : अमरूक लोकक बात जे पढ़ल-लिखल बुझैत तँ एहिना दुनियाँ रहैत।
छातीपर हाथ राखि बाजह जे दस-बारह बरिससँ एक्को-पाइ नूनो-तेल ले देलह?
अनुराधा : ई दोख हिनकेटा मे नै, हिनका सन-सन सभ सासुमे आबि गेलहेँ।
रागिनी : ऐमे तोहर दोख नै छह, दोख छै जुग-जमानाक विचारकेँ। जेहेन जुग
हएत तेहने ने विचारो हएत आकि जेहने विचार हएत तेहने ने जुगो हएत। परोछा-परोछी
नै बजै छी, सोझमे कहलियह हेन। धरमागती बाजह।
(तत्-मत्
करैत अनुराधाकेँ देख..)
रविन्द्र : माए, तोहर बात कटैबला नै अछि। तखन मोनमे यएह रहल जे सभ किछु
तँ अछिये तखन जरूरते की पड़तै।
रागिनी : तूँ पुरुख जाति किआँने गेलहक माइयक छातीकेँ, जे बच्चाकेँ
छातीक दूध पिआ ठाढ़ करै छै ओकरा आगूसँ जँ बच्चा हटा लेल जाए तँ ओइ माइक दशा की
हएत?
रविन्द्र : (मुड़ी डोलबैत) हँ, से तँ हएत।
रागिनी : हम तोरा कहाँ कहै छिअह जे कमा कऽ सभटा हमरे दऽ दए, ओते खगतो
ने अछि। तँू नोकरी करै छह, सरकारक काज
करै छहक, मुदा पुतोहु बाल-बच्चा। जँ एहेन पुतोहु भगवान देथि जिनकर हाथक भोजन
पइठ नै हुअए तइसँ नीक जे नहिये देथि।
रविन्द्र : से कि, से कि माए?
रागिनी : किछु ने।
रविन्द्र : मोनमे एते दुख नै कर।
रागिनी : दुखो वएह नीक होइ छै जइसँ किछु भेटै छै। जइसँ किछु भेटल नै
तइसँ नीक जे मोनमे दुख अबै ने दी। जहिये अपने (पति) संग छोड़लनि तइ दिन मोनकेँ
बुझा देलिऐ जे संग पुरैक हाथ जे पकड़ने छलाह तिनकासँ हाथ छुटि गेल।
अनुराधा : माए, अनेरे ई सोग अरजि-अरजि बोझ बना माथपर रखने छथि।
रागिनी : हमहीं किअए राखब, सभ बाप-माए, दादा-दादी अपन अगिला परिवारक
बोझ माथपर रखैए। दस बर्खक पोता अछि, जेकरा आइ देखलौं हेन। यएह मनोरथ भगवान देलनि।
अनुराधा : अपने नै जाइ छथि आकि हम सभ मनाही करै छियनि?
रागिनी : मनाही दू रंगक होइ छै, एकटा होइ छै जे मुँह फोड़ि कहब आ देसर
होइ छै उनटा बात-विचार। पहुँनाइयो लाथे जे जाएब से ने काहे-कूहे बाजए अबैए आ ने एक्कोटा
चिन्हार लोक भेटत।
अनुराधा : हम सभ जे छियनि?
रागिनी : कहलौं तँ बेस बात मुदा बेटा-पुतोहु आकि परिवारक आने, सभकेँ
एक सीमा छै। सीमा भीतर गपे कते रहै छै। मुदा चौबीस घंटाक दिन-राति छोट तँ नै
होइए।
अनुराधा : फेर लोकक आएब-जाएब रहै छै आकि नै?
रागिनी : की उत्तर देबह।
रविन्द्र : किअए, किअए माए चुप भेलँह?
रागिनी : चुप की हएब। तँू सभ चुप केने छह। जइ घरमे जन्म लेलह,
खेललह-धुपलह, पढ़ि-लिख नोकरी पौलह, ओही घरकेँ बिसरि गेलह।
रविन्द्र : की करबै तते काज बढ़ि गेल अछि जे नीनो हराम भऽ जाइए।
रागिनी : हम से कहाँ किछु कहै छिअह। मुदा कान खोलि दुनू बेकती सुनि
लाए जे जहिना अपने (पति) अपन लगाओल गाछीमे बास करै छथि तहिना हमहूँ बास करब।
जहिना तूँ अपन मोनक मालिक छह तहिना हमहूँ छी।
रविन्द्र : आशा लगा आएल छलाैं।
रागिनी : तोहर आशा भग्न कहाँ होइ छह। अखने आँखि मूनब, सभटा तँ तोरे
हेतह। हमरो तँ जिनगी अछि। जिनगीक लेल तँ सभ कथुक बेगरता सभकेँ रहै छै।
रविन्द्र : आब कते दिन....?
रागिनी : जिनगीक कोनो ठेकान अछि, अखनो टन कहि देब आ पच्चीसो पचास
बर्ख जीब सकै छी। तइले.....?
(पीपरावाली
माथपर छिट्टा लेने प्रवेश...)
पीपरावाली : दादी, भगवान हिनका भल करनु बड़बढ़ियाँ कमाइ भेल। दुनू भाए-बहिनकेँ
आंङी-पेंट कीनि देलिऐ।
रागिनी : भगवान भल करथुन। मुदा उसरलमे एहल। आब कहाँ कोनो बरतन-बासन रहल।
जतबेक बेगरता होइए ततबे अछि।
रविन्द्र : घरक सभ बरतन बेचि लेलेँ माए?
रागिनी : मोनसँ नै हटै छलए, मुदा दोसर उपाइये की?
रविन्द्र : आब केना चलतौ?
रागिनी : अखैन तक तँ बरतने-वासन सठल। अखैन गहना-जेबर तँ अछिये। जेकरा
बेसी छै ओकरा लेल गहना श्रृंगारक बौस छिऐ आ जेकरा नै छै तेकरा लेल पेटेक आगि मिझबैक
सम्पत्ति।
रविन्द्र : कोन वस्तु छलै कनियाँ, जे बढ़िया कमाइ भेल?
पीपरावाली : काका, हिनकासँ लाथ कोन। जहिना दादी तहिना ने इहो छथि। तामक
तमघैल छलै।
अनुराधा : आब तँ तामक दाम बहुत बढ़ि गेल अछि।
रविन्द्र : कोन चीज सस्त रहल।
रागिनी : बौआ, से बात नै छै, महग बौस सस्ता भऽ गेल आ सस्ता वस्तु
महग।
अनुराधा : से की?
रागिनी : की कहबह। जखैन मनुखे अपन मोल नै बुझैए तखन चरचे की?
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