कल्याणी एकांकी :: पहिल दृश्य-
(जहलक
दृश्य। जेलक भीतरसँ जेलर, कल्याणी, प्रतिज्ञा आ दूटा सिपाही निकलैत। फाटकक
बाहर आबि कल्याणीयो आ प्रतिज्ञो पाछू घुिर जहलकेँ निग्हारि-निग्हारि देखैत
अछि।)
जेलर : अखैन धरि हम जेलर आ अहाँ दुनू गोटे कैदी
छलौं। मुदा आब जहिना अहाँ दुनू गोटे छी तहिना हमहूँ एकटा अदना मनुख छी। जेलक जिम्मेदार
होइक नाते कहै छी जे जँ किछु अभाव भेल हुअए ओ बिसरि जाएब। संगे इहो कहै छी जे
पुन: कैदी बनि जहल नै देखी।
कल्याणी : (मुस्कुराइत) कहलौं तँ बड़
सुन्नर बात मुदा जइठाम एक्को इंच जमीन नारीक लेल सुरक्षित नै अछि तइठाम......?
जेलर : की
सुरक्षित?
कल्याणी : सुरक्षित यएह जे नारीक लेल स्वतंत्र जिनगी कल्पनाक सिवा
आरो की अछि। जाधरि नारी अपन शक्तिकेँ जगा संघर्ष नै करत ताधरि मनुखक जिनगीसँ
उतरि पशुक जिनगी जीबैक लेल बाध्य रहबे करत। तँए जरूरति अछि अपन शक्ति
नारी जगतक लेल उपयोग करए। जखने आजादीक लेल डेग उठौत तखने अहाँक जेल आगू ऐबे करत।
प्रतिज्ञा : कते दिन जहलक डरे नारी अपन स्वतंत्र जिनगीकेँ
बान्हि कऽ राखि सकैए। जेम्हर देखू तेम्हर नारीपर अत्याचारे-अत्याचार जहिना
घरक भीतर तहिना घरक बाहर। सगतरि एक्के रामा-कठोला भऽ रहल छै। घरसँ निकलिते कतौ
अपहरण तँ कतौ छेड़खानी सदतिकाल होइते रहैत अछि। एहेन स्थितिमे इज्जत-आबरूक
संग जीब कहाँ धरि संभव अछि।
जेलर : (मुड़ी
डोलबैत) किछु अंशमे अहाँ कहब मानल जा सकैत अछि।
कल्याणी : (झपटि कऽ) किछु अंशमे किअए
कहै छिऐ हँ, ई बात जरूर जे जहिना सभ मनुखक जिनगी समान नै अछि तहिना अत्याचारोक
अछि। मुदा जेहेन माहौल बनल अछि ओइसँ की आभास भेट रहल अछि।
जेलर : (नम्हर
साँस छोड़ैत) खैर, हमर ओकातिये कते अछि जे अहाँक सभ प्रश्नक उत्तर दऽ
सकै छी। मुदा एते जरूर आग्रह करब जे पुन: जहलक आँखि नै देखी।
कल्याणी : जँ जहलक डर करब तँ जिनगी केना भेटत। हँ, ई
बात जरूर जे छोटसँ छोट आ पैघसँ पैघ सैकड़ो घेराक बीच जहलो एकटा घेरा छी। मुदा ओकरा
टपैक तँ दुइये टा उपाए अछि। या तँ कूदि कऽ टपि जाय वा तोड़ि दिअए।
जेलर : (मुड़ी
डोलबैत) धिया-पूताक खेल नै छी।
कल्याणी : मानै छी जे धिया-पूताक खेल नै छी मुदा अहूँ सुनि लिअ जे जइ
पौरूष पाबि नर पुरुष कहबैक अधिकारी बनल अछि ओ िसर्फ पुरुषेक नै नारियोक धरोहर
सम्पदा छी। अखैन धरि नारी जगतक नजरि ओइ दिशा दिस नै बढ़ल अछि तँए आँखि
मूनि सभ अत्याचार झेल रहल अछि। जखने ओइ दिशा दिस देख आगू डेग उठौत
तखने......।
जेलर : (मुस्कुराइत) हमर
शुभकामना अहाँ सभक संग अछि।
(कल्याणी
आ प्रतिज्ञा आगू बढ़ैत। दुनू सिपाही फाटकक भीतर प्रवेश करैत। बीचमे जेलर ठाढ़ भऽ
कल्याणी दिस देखैत। दू डेग आगू बढ़ि कल्याणी पाछू घुरि कऽ तकैत। दुनूक–- जेलर आ कल्याणी- आँखिपर आँखि पड़िते कल्याणी
मुस्कुरा दैत। जेलर आँखि निच्चाँ कऽ लैत। पुन: कल्याणी आगू डेग उठबैत। जेलरो
भीतर दिस प्रवेश करैत। एकटा पएर भीतर आ एकटा पएर बाहर रहिते पुन: कल्याणी दिस
देखैत। तै काल कल्याणियो दुनू गोटे पाछू
घुिर तकैत तँ जेलरपर नजरि पड़ैत।)
जेलर : (दुनू
हाथ जोड़ि) अंतिम विदाइ।
कल्याणी : (मुस्की दैत) अंतिम विदाइ
नै पहिल विदाइ। जाधरि अहाँक जहल रहत ताधरि एक नै हजरो बेर आएब।
(फाटक
बन्न कऽ जेलर भीतर जाइत अछि। कल्याणी आ प्रतिज्ञा दू डेग आगू बढ़ि)
कल्याणी : अखैन धरि जहिना अहाँ कओलेजक एकटा छात्रा छी तहिना हमहूँ
छी। मुदा आब तँ पढ़ाइक अंतिमे समए छी। परीक्षो भइये गेल। रिजल्ट निकलत जिनगीक
लीला शुरू हएत।
प्रतिज्ञा : जिनगिऐक लीला किअए कहै छी नावालिकक सीमा
सेहो टपि गेलौं। जहिया जेल एलौं तहिया ने नावालिक छलौं। जइसँ देश आ समाजक
प्रति ने कोनो अधिकार छलए आ ने कोनो कर्तव्य। मुदा से तँ आब नै रहल। ओना
बालबोधे जे किछु केलौं ओहो कोनो अधला थोड़े केलौं।
कल्याणी : अखैन धरि जे किछु भेल ओ बाल-बोधक खेल भेल।
मुदा जहलक भीतर नावालिकक सीमा टपि वालिक भेलौं। १८ बर्ख पूरा भेल। जिनगीक लेल
आइ संकल्प ली जे जाधरि नरीक अन्याए होइत रहत ताधरि चैनक साँस नै लेब।
प्रतिज्ञा : अखैन धरि ने अहाँकेँ ऐ रूपे हम चिन्हैत
छलौं आ ने अहाँ हमरा चिन्है छलौं। तँए दुनू गोटे संकल्पक संग सप्पत ली जे
जाधरि साँस रहत ताधरि संग-संग रहब।
कल्याणी : निश्चित। जे कियो ऐ धरतीपर जन्म नेने
अछि सभकेँ स्वतंत्र रूपे जीवैक अधिकार छे (किछु काल चुप भऽ) सृष्टिक
शुरूहेसँ देखैत छी जे जहिना ऋृषि भेलाह तहिना ऋृषिका सेहो भेलीह। (पुन:
रूकि) संग-संग िजनगी बितैबतौं पुरुष नारीक संग भीतरघात करैत-करैत सकपंज कऽ
देलनि। जेकर परिणाम भेल जे ओकर पहाड़ सदृश रूप बनि गेल अछि।
प्रतिज्ञा : (मुड़ी डोलबैत) हँ, से तँ बनि गेल
अछि। मुदा जहिना रसे-रसे बंधन सक्कत होइत गेल तहिना रसे-रसे तोड़ौ पड़त। एक्के
बेर जँ सभ बंधनकेँ तोड़ए चाहब से संभव नै छै।
कल्याणी : (मुड़ी डोलबैत) ई तँ अछि। मुदा दुनियाँमे
एहेन कोनो काज नै अछि जेकरा मनुख नै कऽ सकैत अछि। तहन ई बात जरूर अछि जे जे जेहेन
काज रहत ओहिक लेल ओइ तरहक शक्तिक जरूरति पड़ैत। तँए जरूरी अछि जे जहिना अखैन
हम दुनू गोटे मिलि संकल्प लेलौं तहिना आरोकेँ जोड़ि शक्तिक अनुकूल डेग
उठाएब।
प्रतिज्ञा : हँ, से तँ कहलो गेल अछि जे “जमात करए
करामात।”
जेना-जेना दुर्ग टपैत जाएब तेना-तेना शक्तियो बढ़ैत जाएत। जहिना बुन-बुन पानि मिलि
धरतीपर ससरि धारा बनि धारक आकार बना समुद्रक रूप ग्रहन करैत तहिना ने मनुष्योक
होएत।
(())
दोसर दृश्य-
(जहलक
बाहरी छहरदेवाली टपि कल्याणी आ प्रतिज्ञा। दोसर िदससँ कल्याणीक भाए चन्द्रनाथ
आ माए शान्तीकेँ देखैत तँ दोसर दिससँ शान्ती कल्याणीपर नजरि अटकौने। जना शान्तीकेँ
बघजर लगि गेल दुनू आँखिसँ नोट टघरैत। मुदा कल्याणी आ प्रतिज्ञाक मुँहसँ खिलैत
माने फुलाइत फूल जकाँ हँसी निकलैत।)
कल्याणी : (आगू बढ़ि) माए, अहाँ कनै
किअए छी? बेटी
कोनो अधला काज कऽ जहल नै आइलि छलि। (कहैत दुनू हाथे दुनू पएर पकड़ि)
अहाँ असिरवाद दिअ। जहिना समाजक आन माएसँ हटि अहाँ पढ़ैक छूट देलौं तहिना हमरो
दायित्व होइत अछि जे समाजक कल्याणक दिशामे आगू बढ़ी। जाधरि परिवारक डेग
आगू दिस नै बढ़त ताधरि समाज कोनो बनत?
(दुनू
बाँहि पकड़ि शान्ती कल्याणीकेँ उठबैत। कल्याणी उठि कऽ माइक दुनू आँखिक नोर दुनू
हाथसँ पोछि आँखिपर आँखि गरा आगूमे ठाढ़ि। शान्तीक आँखिसँ धरती, पहाड़, समुद्रक
रूप छिटकैत तँ कल्याणीक आँखिसँ सिंहक रूप छिटकैत)
चन्द्रनाथ : अहाँ सभ ताबे एतै अँटकू। एकटा सवारी नेने अबै छी। (कहि भीतर जाइत)
प्रतिज्ञा : चाची, आइ धरि नारी जगत, कमला-कोसीक धारक संग कारी मेघक बरखा सदृश
अदौसँ नोर बहबैत आएल अछि मुदा जाधरि ओइ नोरकेँ बहैक कारणकेँ नै रोकल जाएत
ताधरि बहब केना बन्न हएत? जहिना
बेटी कल्याणी छी तहिना प्रतिज्ञो छी। असिरवाद दिअ।
शान्ती : (माइक नजरिसँ नजरि मिला) तँू सभ जहल किअए ऐहल?
कल्याणी : परीक्षाक आखिरी दिन एक्केटा विषएक परीक्षा रहै। जे दोसर
खेपमे माने दोसर सत्रमे रहै। चारि बजे समाप्त भेल। ओना प्रश्न हल्लुके बूझि
पड़ल। जहाँ सवाल पढ़लौं आकि मोन हल्लुक भऽ गेल। नीक जकाँ लिखलौं। डेरा अबैत रही
आकि रस्तामे देखलिऐ........।
शान्ती : की देखहलक?
कल्याणी : आगू-पाछू विद्यार्थी (संगी) सभ डेरा अबैत रहै। हम दुनू
गोरे (कल्याणी आ प्रतिज्ञा) पाछू रही। हमरासँ करीब चारि लग्गी आगू रूपा असगरे
अबैत रहै। मोटर साइकिलपर एकटा युवक पाछूसँ जाइत रहै। रूपा लग आबि पहुँचते साइकिलेपर
सँ देह परक ओढ़नी खींचि लेलक।
(ओढ़नी
खिंचैक सुनि शान्ती चौंकि गेलि। जना बाँसक दू टुकड़ी रगड़सँ आगिक लुत्ती छिटकैत तहिना शान्तीक आँखिसँ लुत्ती छिटकल)
शान्ती : अँए, एते अन्याए?
प्रतिज्ञा : चाची, अहाँ गाम-घरमे रहै छी तँए नै दखै छिऐ।
एहेन-एहेन अन्याए हजारक हजार रोज होइए।
शान्ती : राही-बटोही किछु ने कहै छै?
प्रतिज्ञा : की कहतै। निर्लज पुरुख नारीक लाज (इज्जत)
थोड़े बुझैए। उ सभ तँ नारीकेँ खेलौना बनौने अछि। एक्के पुरुख अपन बहु-बेटीकेँ
इज्जतक नजरिऐ देखैत अछि मुदा दोसराकेँ रण्डी-बेश्या बुझैत अछि।
(क्रोधसँ शान्ती थर-थर कँपए लगल। दुनू
आँखि लाल भऽ गेलै)
शान्ती : तब की भेलै?
प्रतिज्ञा : बेचारी रूपा, आगू-पाछू ताकि, मुड़ी गोति
आगू बढ़ैत गेल। मुदा हमरा दुनू गोरेकेँ नै देखल गेल। सड़कक कातेमे पीचक पजेबा
उखड़ल रहै। दुनू गोटे पजेवा हाथमे लऽ दौग कऽ ओकरापर फेकलौं। एकटा तँ हूसि गेलै।
मुदा दोसरक कपारमे लगलै।
शान्ती : वाह-वाह, भगवान हमरो औरुदा तोरे सभकेँ देथुन।
भाँइमे कियो दादा हुअए। नारी-जातिक सान बचेलौं। तेकर उत्तर की भेल?
प्रतिज्ञा : ओ साइकिलपर सँ खसि पड़ल। कपारसँ खून
गड़-गड़ चुबए लगलै। हल्ला भेलै। तखने ट्रैफिक पुलिस आबि कऽ दुनू गोटेकेँ पकड़ि
पहिने थाना लऽ गेल। थानासँ जहल पठा देलक।
शान्ती : मुदा हम तँ दोसरे-तेसरे बात सुनलौं।
प्रतिज्ञा : की?
शान्ती : कते बाजब कोइ किच्छो तँ कोइ किच्छो
बाजैए। एक गोरे कहलक जे दुनू गोटे परीक्षामे चोइर करैत पकड़ल गेल।
प्रतिज्ञा : चाची, झूठकेँ सत्य बनाएब आ सत्यकेँ झूठ बनाएब छुद्दर पुरुख सभक
गुण छी। जहिना बहिन कल्याणीक माए छिऐ तहिना हमरो छी अहाँ लग झूठ बाजब।
शान्ती : (किछु मोन पाड़ैत) बेटी प्रतिज्ञा, तँू जे कहलह ओ अपनो मोनमे
अबैए। मुदा बिना पुरुखक मदतिऐ नारी जीब केना सकैए?
कल्याणी : (उत्साहित भऽ) माए बिना पुरुखक नारी
जनकपुरमे। अखैन धरि नारीकेँ पुरुख अन्हारमे रखलक। जइसँ ओकरा अपन सभ गुन हरा
गेलइ। घरक भीतर रखि ओकरा दुनियाँक बात बुझै नै देलक। जइसँ ओ परती खेत नहाति सभ
किछु रहितो पानि-बिहाड़ि, जा़ड़, रौद, भुमकमक चोटसँ निष्क्रिय भऽ गेल।
शान्ती : ऐ बातकेँ नारी किअए ने अखैन धरि बूझि रहल
अछि?
कल्याणी : एकरो कारण छै। सृष्टिक निर्माण पुरुष
नारीक संयोगसँ होइत अछि। जहिना गाड़ी, दू पहियासँ चलैत अछि, तहिना। मुदा
नारीक पेटमे नअ मास रहि बच्चाक जन्म होइत अछि। ऐ दौरमे नारीकेँ कठिन कष्टक
सामना करए पड़ैत अछि। जेकर लाभ पुरुख उठौलक।
शान्ती : (मुड़ी डोलबैत) हूँ...।
कल्याणी : बच्चाक पालन खाली पेटे धरि नै जन्म लेलाक
पछातियो होइत अछि। जइमे घेरा जाइत अछि। घेराइत-घेराइत एत्ते घेरा जाइत जे जिनगी
बदलि गुलाम बनि जाइत अछि।
शान्ती : (मुड़ी डोलबैत) एहेन स्थितिमे नारी
पुरुखक बराबरी केना कऽ सकैत अछि?
प्रतिज्ञा : (उत्तेजित भऽ) कए सकैए, चाची।
(सवारी
लऽ कऽ चन्द्रनाथक प्रवेश)
चन्द्रनाथ : चलै चलू। सवारी आबि गेल।
(())
तेसर दृश्य-
(अनन्त
कुमारक घर। दरबज्जापर एकटा चौकी राखल आ बगलमे कुरसीपर अनन्त कुमार बैसि, आँखि
बन्न केने)
अनन्तकुमार : (स्वयं) दिनो-दिन जिनगी जपाल भेल जा रहल अछि।
जे दिन जे क्षण बीत रहल अछि ओ नरकक वास भऽ रहल अछि। मुदा मऽरबो तँ हाथमे नहियेँ
अछि अपने हाथे आत्महत्यो केना कए लेब?
(चाह
नेने शान्तीक प्रवेश। पतिक हाथमे कप पकड़बैत शान्ती चौकी बगलमे ठाढ़। एक घोट
चाह पीबि अनन्त कुमार शान्ती दिसि देखि।)
अनन्तकुमार : जिनगी भार भऽ गेल। अकाजक अन्न सन देबकेँ हत्या
करैत छी। नीरस बिना रसक जिनगी कोकनल गाछ सदृश होइत अछि। जे पिल्लू, गराड़क
घर बनि जाइत अछि तहिना जिनगी बूझि पड़ैए।
शान्ती : सोग केलासँ सोग थोड़े मेटाएत। सोग तँ समस्याकेँ जनम
दइए। जे बिना केने थोड़े मेटाएत?
अनन्तकुमार : जखने घरसँ निकलै छी तखने रंग-विरंगक अड़कच-बथुआ काचर-कुचर
सुनए लगै छी। केकरा की कहियौ। कते लोकसँ माथ चटाउ। केकरो मुँहमे जाबी लगौनाइ
असान छी।
शान्ती : कते दिन मुड़ी गोंित समाजमे जीब?
अनन्तकुमार : नीक हएत जे झब दए कल्याणीक बिआह करा दिऐ। आन गाम गेलापर
तँ लोकक बात नै सुनब। जहिना पोखरिक पािनक िहलकोर जे दू-चारि दिनमे शान्त भऽ
जाइत छै तहिना असथिर भऽ जाएत।
(चन्द्रनाथक प्रवेश)
शान्ती : भने बउऔ आबिऐ गेल। दुनू बापूत छीहे विचारि कऽ रास्ता
नकालि लिअ।
चन्द्रनाथ : (अकचकाइत) कथीक रास्ता माए? कोन एहेन दुर्ग
टूटि कऽ खसि पड़ल जे बाबूकेँ हम विचार देबनि।
अनन्तकुमार : बौआ, नीक की बेजाए, अपना परिवारमे नै बाजब तँ कतए बाजब।
जखने गाम दिस टहलै छी, सोझा-सोझी तँ नै मुदा अढ़ दाबि-दाबि मौगियो आ मरदो की
बजैए तेकर कोनो ठेकान नै।
चन्द्रनाथ : की बजैए?
अनन्तकुमार : कियो बजैए जे कल्याणी जहल जा कुल-खनदानक नाक-कान कटौलक।
तँ कियो बजैए जे केहेन माए-बाप छै जे बेटीक वएस बीतल जाइ छै मुदा बिआह करैले
नीने ने टुटै छै।
चन्द्रनाथ : बाबू, जहिना दिनक उनटा राति होइ-छै तहिना
नीक अधलाक बीच सेहो होइ-छै ज्ञान-अज्ञानक बीच सेहो होइ छै। धरतीपर ओते अधलो अछि।
हमरा बुझने तँ अधले बेसी अछि। किऐक तँ नीक एक्के तरहक होइ छै जहनकि अधला अनेको
रंगक- रावण-कौरबक सखा जकाँ।
अनन्तकुमार : ततबे नै ने इहो बजैए जे पढ़ा-लिखा कऽ बेटी तेहेन
बना लेलक जे चौक-चौराह पुरुखे जकाँ मुँह-कान उधारि निधोख भाषणो करैए।
चन्द्रनाथ : बाबूजी, हमर बहिन कुम्हरक बतिया नै ने छी जे
ओंगरी बतौने सड़ि जाएत। जँ कियो आँखि उठाओत वा ओंगरी बताओत तँ ओकर आँखियो
फोड़ि देबै आ ओंगरिओ काटि लेबै। अपन माए-बहिन दिस देखह जे माटिक मुरुत
बनौने अछि।
शान्ती : बौआ, हम दुनू परानी तँ पाकल आम भेलौं जाबे
जीबै छी, ताबे जीबै छी। कखनी खसि पड़ब तेकर कोन ठीक। मुदा तँू दुनू भाए-बहिन तँ
से नै छह। भगवान करथुन जे हँसैत-खेलैत शतायु हुअअ।
(कल्याणीक
प्रवेश)
अनन्तकुमार : बेटी कल्याणी, तोरा सभले ओइ गीरहकेँ तोड़ि
देलौं जइ बंधनक बीच कन्या अज्ञानक काल-कोठरीमे जीबैत अछि।
कल्याणी : बाबूजी, जहिना अहाँ समाजमे पहिल डेग उठा नव
फुलक गाछ रोपलौं तहिना अहाँक आत्मा एक नै अनेक फुलक फुलवाड़ी लगौत।
शान्ती : बेटी, भगवान हमरो दुनू बेकतीक औरुदा तोरे
दुनू भाए-बहिनकेँ देथुन। जाबे बच्चा छेलह ताबे जतए धरि भऽ सकल सेवा केलियह।
आब तँ तोरे सबहक दिन-दुनियाँ भेलह, हम सभ तँ अस्ताबल भेलौं।
कल्याणी : माए, नारीक संग अत्याचार करैत-करैत पुरुख
एहेन अभियस्त भए गेल अछि जे उचित-अनुचितक सीमे समाप्त भऽ गेल छै। जइसँ नारी
खसैत-खसैत एते निच्चाँ खसि पड़ल अछि जे स्वरूपे समाप्त भऽ गेल अछि।
अनन्तकुमार : (मुड़ी डोलबैत) हँ, से तँ भऽ गेल अछि।
कल्याणी : बाबू, ई दुिनयाँ कर्मभूमि छी “वीर भोग्या
बसुंधरा” जे जेहेन
कर्म करत ओ ओहन फल पाओत। जहिना डोरीक एक भत्ता अहाँ तोड़ि हमरा अन्हारसँ इजोतक
रस्ता खोललौं। तहिना एक-एक भत्ता तोड़ि नारी जगतक बन्धन तोड़ि देबै।
अनन्तकुमार : बंधन तँ सक्कत अछि मुदा ओकरा तोड़नौं बिना तँ
कल्याण नहियेँ अछि। मुदा ऐ लेल ज्ञान, साहस आ धैर्यक जरूरति अछि।
कल्याणी : (मुस्की दैत) पौरूष सिर्फ पुरुखे
लेल नै नारियोक लेल विधाता देने छथिन। जरूरति अछि ओकरा पकड़ेक। हमहूँ आब
नावालिक नै बालिक भेलौं ततबे नै किरिणक
डोरसँ सुनि सेहो देख लेलौं। जहिना सृष्टिक िवकासमे पुरुष-नारी समान अछि
तहिना जाधरि दुनूक बीच समानता नै आाअेत ताधरि चैनक साँस नै लेब
अनन्तकुमार : बहुत कष्ट हएत?
कल्याणी : (हँसैत) “जीवन नया मिलेगा,
अंतिम चिता मे जल के”। जहिना
भिनसुरका सूर्ज देखने दिनक अनुमान होइत अछि तहिना तँ नबालिगक आड़ि हमहूँ
जहलेमे टपलौं कि ने।
(())
चारिम दृश्य-
(दरबज्जाक
चौकीपर चद्दरि ओढ़ि, मुँह उधारने अनन्त कुमार पड़ल। पँजरामे शान्ती बैसल)
शान्ती : (देह छूबि) बोखारसँ देह जरैए आ अहाँ
जिद्द बन्हने छी जे रदबज्जापर सँ अंगना नै जाएब।
अनन्तकुमार : आइ धरि परिवार अंगने भरि रहल मुदा कल्याणी सन
बेटी कुलमे जन्म लेलक। जे आंगनसँ निकलि समाज रूपी परिवारमे रहए चाहैए, बाप
होइक नाते हम दरबज्जो धरि नै अरिआति देबै।
शान्ती : कहलौं तँ ठीके मुदा माए-बाप, बेटा-बेटीकेँ
जनमे ने दइ छै करम तँ अपने काज करै छै।
अनन्तकुमार : हमरा ऐ परिवारक कोनो भार नै अछि जहिना बाबू
दरबज्जा बना कए गेला तहिना अंतिम साँस धरि दरबज्जाक रक्षा माने मान-सम्मान
करैत रहब।
(चन्द्रनाथक
प्रवेश)
चन्द्रनाथ : (अवितहि) बाबू किअए, चद्दरि ओढ़ने
छिऐ?
शान्ती : बोखारसँ आगि फेकै छन्हि। कतबो कहै छियनि जे
पुरबा लहकै छी, चलू आंगन, से कहै छथि जे अंतिम समैमे दरबज्जापर प्राण छोड़ब।
पुरबा-पछबाक काज छिऐ। बहनाइ, बह-अ।
चन्द्रनाथ : बाबू, जे बात अहाँ आइ बजलौं से पहिने कहाँ कहियो
बाजल छलौं।
अनन्तकुमार : तोहर प्रश्नसँ हृदए जुरा गेल बौआ। माए छथुन तँ
फुटल ढोल। भरि दिन पनचैती केने घुरतीह जे सभ शान्तीसँ मिलि-जुलि कऽ रहू। मुदा
जहिना शक्ति बढ़ल जाइत अछि तहिना हिनकर पनचैतियो बढ़ल जाइ छन्हि।
चन्द्रनाथ : (ठहाका मारि) हूँ-हूँ.....।
शान्ती : बुरहा तँ नीक-अधला सभ दिन कहलनि। जखैन-जुआन रही तखन
बरदास भेल आ आब तामस उठत। दुनियाँमे जँ कियो संग पुरलनि तँ सभसँ बेसी यएह ने
पुरलनि। मुदा आब भगवान अन्याए केलनि जे पहिने हमरा नै ओछाइन छड़ौलनि।
अनन्तकुमार : नीक हेतह जे कल्याणियो केँ सोर पाड़ि लहक।
(चन्द्रनाथ
भीतर प्रवेश। कल्याणीक संग मंचपर प्रवेश।)
कल्याणी : बाबू, किछु होइए?
अनन्तकुमार : नै।
शान्ती : की कहथुन। बोखारसँ देह जड़कै छन्हि।
कल्याणी : कोनो दवाइ नै देलहुन?
अनन्तकुमार : दवाइ खाइबला रोग नै छी बेटी। मोनमे एते खुखी आबि
गेल अछि जे सौंसे देह हँसैए।
कल्याणी : (मने-मन सोचैत। मुँहक पोज सुख-दुखक यएह
अवस्था छी) माए किछु कहै छथि अहाँ किछु कहै छी? (आवेशमे
अबैत) किअए बजेलौं?
अनन्तकुमार : कतए गेल छेलह?
कल्याणी : महिलाक एकटा बैसारक आयोजन करए चाहै छी जइमे
विधवा समस्याक संबंधमे विचार करब।
अनन्तकुमार : ई तँ छोट समस्या छह। अखैन नव उत्साह छह पैघ
समस्याकेँ नजरिमे रखि डेग उठाबह।
कल्याणी : (विस्मित होइत) केना ऐ समस्याकेँ
छोट समस्या कहै छिऐ।
अनन्तकुमार : भने तँ समाज दिस डेग उठेबे केलह, बुझवे करबहक।
मुदा पहिने समाजकेँ पढ़ए पड़तह। (उठि कऽ बैसैत) चद्दरि उतारि सिरमापर
रखि दुनू पएर मोड़ि कए बैसैत सभ कियो एकठाम बैसह।
(चारू
गोटे चौकीपर बैस जाइत अछि।)
अनन्तकुमार : सभकेँ अपन परिवारमे, एक सीमा धरि लाज-विचार करक चाही
माइये छथुन पहिने हिनका विषएमे सुनि लाए।
(पतिक
बात सुिन शान्ती देह-हाथ समेटि सांकांक्ष होइत बैसैत। चन्द्रनाथ मुड़ी गोति
लेलक। कल्याणी पिताक आँखिपर आँखि गड़ा लेलक।)
अनन्तकुमार : जहियासँ माए एलखुन तहियासँ जिनगीक अंतिम
पड़ाव धरि संगे छी। गुण-अवगुण मनुखमे होइते अछि। मुदा सदतिकाल दुनूपर नजरि
रखि गुणकेँ बढ़ेबाक आ अवगुणकेँ कम करबाक कोशिस करक चाही। जइसँ नीक रास्ता पकड़ि
आगू बढ़ब।
कल्याणी : ई तँ बड़ कठिन काज छी, बाबू।
अनन्तकुमार : (मुस्की दैत) हँ, ई विवेकक काज छी। अही
दुआरे मनुख सभ जीवसँ ऊपर भेल। ओना ऊपर होइक दोसरो कारण ई अछि जे धरतीपर जते
जीव-जन्तु अछि तैमे मनुख अंतिम रूप छी।
कल्याणी : माइक चरचा करए लगलिऐ?
अनन्तकुमार : हँ। देखहक, ऐ धरतीपर अनेको लोक अछि। जेकर सीमा
निर्धारित कर्म आ ज्ञान केने अछि। ऐ अर्थमे माए बहुत दूर छथुन। मुदा अहूँ
अवस्थामे आत्मा माने विवेक सएह कहैए जे अखनो धरि दोसराक पैतपाल करबाक शक्ति
छन्हि।
चन्द्रनाथ : (मुड़ी उठा) एते दिन किअए......?
अनन्तकुमार : हँ, ठीके तँू पूछए चाहै छह। जहिना माली, बिना फूलक बीआ
देखनौं पात देख, बूझि जाइत अछि जे ई अमुक फूलक गाछ छी। तहिना कल्याणीकेँ देख
विवेक जगि गेल।
चन्द्रनाथ : एते दिन विवेक सुतल छलै?
अनन्तकुमार : नै बौआ, जहिना आमक गाछक जड़िमे जनमल तुलसी गाछक
बाढ़ि ठमकि जाइत अछि तहिना ठमकि गेल छलै। मुदा कल्याणीक आँखिक ज्योति
जहिना सुनयनाक बेटी सीताक छलनि तहिना बूझि पड़ैए। तँए अनायास विवेक पोनगि
गेल।
कल्याणी : माए, बाबूक संग अहूँ असिरवाद दिअ।
शान्ती : अखैन धरि जे डीह, पुरखाक कएल काजक इतिहास छी ओकरा
जीबित दुनू भाए- बहिन मिलि राखब।
कल्याणी : झाँपल-तोपल बात अहाँक नै बूझि सकलौं।
शान्ती : हम तँ बेसी-बिसरिये गेलौं। बाबूए कहथुन।
अनन्तकुमार : बेटी कल्याणी, पहिने परिवार बूझि लहक। तँू दुनू भाए-बहिन
छह। जहिना तँू घरसँ निकलि दोसर घर जेबह तहिना दोसरा घरसँ अपनो घर औतीह। ऐसँ मनुखक
स्थानान्तर (ट्रान्जेक्शन) शुरू भेल। ओना अपनो परिवारमे लड़का-लड़की होइत
(जन्म) अछि, किअए दोसर परिवारसँ संबंध जोड़ल जाइत अछि?
(चन्द्रनाथ
बहिन दिस हाथ बढ़ौलक, कल्याणी भाइक हाथमे हाथ रखलक। माटिक मूर्ति जकाँ अनन्तकुमार
देखैत। अपने मने शान्ती बरबराए लगलीह)
शान्ती : सासु-ससुरक बनौल परिवारकेँ अखैन धरि निमाहि रहल
छी। जहिना बूढ़ा दुआरपर आएल अभ्यागतकेँ बिना हँसौने नै जाइ दइ छेलखिन तहिना अखैन
धरि निमाहल।
कल्याणी : ई तँ काजक भार भेल, माए। मुदा असिरवादो ने चाही?
शान्ती : बेटी, सामाक माए-बाप जकाँ, तोहर माए-बाप नै छथुन। जहिना
सामाक लेल चकेबा सभ किछु त्यागि संग पुरलक तहिना तोरो भाए करथुन।
(चन्द्रनाथकेँ
भारसँ दबैत देख अनन्त कुमार)
अनन्तकुमार : हँ, कहै छेलियह। जहिना कम्पोजिट (शंकर) बीज उन्नतिशील
होइत तहिना मनुष्योक प्रक्रिया अछि। (बात बदलैत) सदतिकाल माए माथ खोड़ैत रहै
छथुन जे किअए बेटीक (कल्याणीक) बिआह अनठौने छी। मुदा हम अनठौने कहाँ छी।
कल्याणी : (आँखिलाल केने) बाबू......।
अनन्तकुमार : (मुस्कुराइत) बेटी हुनको विचार
अधला नहिये छन्हि। बेटीक प्रति माएक ममता वेसी होइ छै। मुदा पिरवारमे बिआह
साधारण काज नै छी। तहूमे अखैन, सभ तरहक संक्रमणक प्रक्रिया चलि रहल अछि।
चन्द्रनाथ : की संक्रमण?
अनन्तकुमार : पहिने अपन इतिहास बूझि लाए। अदौमे स्वयंवर प्रथाक चलनि
छल। जहिक माध्यमसँ माए-बाप बेटा-बेटीकेँ भार दऽ देलकनि। मुदा आइ की देखैत छहक
जे तते ओझरी लगि गेल जे जते सोझरबैक रस्ता अपनौल जाइत अछि ओते ओझरी बेसयाइये जाइ छै।
कल्याणी : बाबू, हमहूँ अबोध बच्चा नै छी बालिग भेलौं।
तँए......।
अनन्तकुमार : बिल्कुल ठीक सोचै छह। जखैन महिलामे पेंइतालीस-पचास बर्ख
धरि सन्तान उत्पन्न करबाक शक्ति रहैत अछि तखन कम उम्रमे बिआह तँ बड़
जरूरी नहिये भेल?
कल्याणी : असिरवाद िदअ। समाजक बीच किछु करबाक िजज्ञासा भऽ
गेल अछि।
अनन्तकुमार : बेटी, हृदेसँ असिरवाद दइ छिअह। जहिना अदौमे कोनो अछुत
जाति जखैन कोनो गाममे प्रवेश करैत छल तखैन कोनो एहेन बाजा बजबैत छल जे लोक बूझि
जाइत छलै।
कल्याणी : (चकोना होइत) की कहि देलिऐ?
अनन्तकुमार : पुरना गप कहलियह। आब तँ गीताक जुग एलै। तँए जहिना कृष्ण
कुरुक्षेत्रमे शंखक अावाजसँ अपन जानकारी दैत छलखिन्ह। तहिना......।
कल्याणी : (आँखि-कान चकोना करैत चारू भाग देख) कने
बुझा कऽ कहियौ?
अनन्तकुमार : समाजमे किछु करए चाहै छह तँ काल्हिये बेरू पहर दुर्गास्थानमे
बैसार करह।
कल्याणी : काल्हिसँ नीक जे रवि दिन बैसार करब नीक रहत। ओइमे
नोकरियो चाकरियो सभ रहता।
अनन्तकुमार : नोकरी-चाकरी कए कऽ जे गामक नास केलक ओकरा बुते गाम बनौल
हएत। जहिना भिनसुरकेे सूर्य देखलासँ दिन भरिक अनुमान लोक कऽ लैत अछि तहिना मनुखक
किरदानिये देख कऽ मनुखकेँ िचन्हए पड़तह।
कल्याणी : हुनका बुते केना गामक विचार कएल हेतनि।
अनन्तकुमार : (खिसिया कऽ) दिल्ली
सरकारमे सभसँ बेसी बिहारक रेलमंत्री भेलाह। मुदा की देखै छहक? जेकरा तँू अबोध
कहै छहक ओकर जिनगियो छोट छै। जिनगीक समस्यो कम होइत अछि।
कल्याणी : अखने जा कऽ ढोलियाकेँ ढोलहो दइले कहि अबैत छियनि।
साँझू पहर ढोलहो दऽ देब।
(())
पाँचम दृश्य-
(दुर्गास्थानक
आगूमे एक भाग पुरुष एक भाग महिला बैसल। एकटा डायरी, पेन नेने महिला दिससँ आगूमे
कल्याणी-प्रतिज्ञा। पुरुष दिससँ सूर्यदेव, क्षितिजदेव, निसकान्त बैसल।)
सूर्यदेव : आजुक बैसारक लेल कल्याणी आ प्रतिज्ञाकेँ हृदेसँ
शुभकामना दैत छियनि जे एकटा नव परम्पराक शुभारंभ केलनि। आशा संग आगू बढ़ति
सएह शुभकामना।
कल्याणी : भाय सहाएब, अहाँ सभ तरहेँ अगुआएल छी तँए आगूक बाटक
जते ज्ञान अहाँकेँ अछि ओते हम थोड़े बुझै छी।
(बीचेमे
निसकान्त)
निसकान्त : सुरजू भाय, हमरो बात सुिन लिअ। काल्हिये दुनू परानीक
झगड़ाक पनिचैतीमे गेल छलौं। बेचारा विसनाथकेँ देखते छिऐ जे डेढ़ सौ रूपैयाक
कमाइ घर जोड़ैयामे करैए। सभ दिन कमा कऽ अबैए आ घरवालीक हाथमे दऽ दैत छै। घरवाली
केहेन जे टी.भी. कीनैले पाइ जमा करैत जाइए। रौद-बसातमे काज करैबलाकेँ एकटा गंजीसँ
थोड़े पाड़ लगतै। तैले घरवाली पाइये ने दैत अछि।
कल्याणी : (मुड़ी डोलबैत) की पनचैती केलिऐ?
निसकान्त : सँए-बहुक झगड़ा पंच लबरा। हम नै बुझै छिऐ जे पावरक लड़ाइ
छी। दुनू गोटेकेँ थोड़-थाम लगा देलिऐ। दू विचारक लड़ाइ हमरे बाप बुते फड़िआएल
हएत।
सूर्यदेव : अच्छा एकटा कहऽ जे दुनू गोटेमे घरक गारजन के छी?
निसकान्त : उँ-हूँ सौंसे गामेमे सबहक घरमे मौगियेक जुति अछि। एहेन
जे लोकक दशा भेल छै से किअए? कमाइ छै कोइ, हुकुम केकरो। कोनो घर आकि कोनो गाम, जाबे
मरदक जुतिमे नै चलत ताबे ओहिना गाम आगू मुँहे ससरि जाएत।
कल्याणी : कविलाहाक खेल देखबै। दिन पनरहम गुरुकाका कानि-कानि
कहैत रहथि जे सभ दिन परदा-पौसकेँ मानलौं। पुतोहुजनीकेँ बेटा नोकरी लगा देलकनि।
दस कोसपर स्कूल छन्हि। दुनू परानी भिनसरसँ खाइ-पीबै राति धरि घूमि कऽ अबै
छथि। बेटा तँ बेटा भेल मुदा पुतोहुक
सेवा सासु कहनि, ई हमरा पसन्द नै अछि?
सूर्यदेव : ई नै पुछलहुन जे समए एना किअए भेल?
निसकान्त : आठ घंटा खटनीक बाद जे समए बचैए- ततबे ने समाजमे समए लगाएब
ओते जे पुच्छा-पुच्छी करैए लगब, से ओते निचेन रहै छी।
कल्याणी : भैया, नारीकेँ बराबर अधिकारक हवा चलि रहल अछि से
की?
सूर्यदेव : मदारी सबहक खेल छी। नारी, पुरुषसँ हीन केना बनैत गेल? जाधरि ऐ इतिहासकेँ
नै देखब ताधरि कारण केना पाएब। केकरोसँ अधिकार मंगबै? ऐ लेल विकासक
प्रक्रियाकेँ नीक जकाँ बुझए पड़त
कल्याणी : काज केना शुरू कएल जाए, भाय।
सूर्यदेव : बहुत बातक जरूरति अखैन नै अछि। मुदा किछु बात कहि
दैत छी। पहिल-नारीकेँ चिन्हए लेल नजरि ओतऽ दिअए पड़त जइठाम हवाइ जहाजमे
उड़ैत, इलाइची फोड़ि-फोड़ि मुँहमे दैत जिनगी अछि तँ दोसर दिस भरि-भरि
छाती पानि टपि (खच्चा, धार) भीजल कपड़ा पहीरि गोबर बिछैक जिनगी अछि।
कल्याणी : (नम्हर साँस छोड़ैत) अद्भुत बात भाय
अहाँ कहलौं।
सूर्यदेव : कल्याणी, अहाँ अखैन फुलाइत फुलक कली छी। तँए जरूरति
अछि शुद्ध माटि-पानिक। प्रत्येक साल समाजमे माने गाममे साएसँ ऊपर आन गामक
बेटी अबैत छथि। गामक बेटी जेबो करैत छथि। प्रश्न उठैत सिर्फ देहेटा अबैत-जाइत
आकि लूरि-बुइध सेहो अबैत जाइत अछि।
कल्याणी : अखैन तँ आरो विकट भऽ गेल अछि जे देशक एक कोनसँ
दोसर कोनमे रहनिहारक (पालल-पोसल) बीच संबंध स्थापित रहल। जइसँ खान-पान, बात-विचार
लूरि-ढंग सभ टकरा रहल अछि।
सूर्यदेव : एहिना खाइ-पीबैमे देखियौ। एक आदमीक (परिवारक) एक
दिनक खर्च जते होइत अछि दोसर दिस ओहन परिवारक भरमार अछि जइ परिवारमे दसो-बर्खक
आमदनी ओते नै छै। केकरो असली नोर चुबै तब ने से तँ पियौजक झाँसक नोर चुबबैए।
कल्याणी : खेती-बाड़ीक की स्थिति अछि?
सूर्यदेव : सरकार मेला लागल। गाममे चारिटा ट्रेक्टर चलि आएल।
एक तँ बाढ़िमे बारह आना बड़द गाममे मरि गेल, दोसर जे चारि आना बचल ओहो सभ गोबर
उठबै दुआरे बेचि लेलनि। अखैन गाममे एक्कोटा बड़द नै अछि। ले बलैया ट्रेक्टर
कदबामे सकबे ने करै छै। खेती कोनो हएत?
कल्याणी : अजीव-अजीव बात सभ कहै छी, भैया?
सूर्यदेव : कते कहब बहिन। जते खर्चमे पहिने लोक
प्रोफेसर बनै छलाह तते अखैन बच्चाक स्कूलमे खर्च हुअए लगल अछि। केकर बेटा
पढ़त। शिक्षा केहेन भऽ गेल अछि धोती-कुरताबला अा पेन्ट-कोटबला अपनामे रगड़
केने छथि जे हम नीक तँ हम नीक। के फड़ियौत? जहनकि प्रश्न नान्हिटा अछि जे जइसँ जिनगी
नीक-नहाँति आगू मुँहे समैक संग ससरै।
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