Monday, March 18, 2013

समझौता :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


एकांकी

समझौता
            पात्र परि‍चए
पुरुष पात्र-

                  श्‍याम (इंजीनि‍यर)
सुकान्‍त (इंजीनि‍यर)
            फुलेसर (मध्‍यम कि‍सान)
कुसेसर
मुनेसर
रौदी
अनुप
झोली (पाँचो- बटेदार)

स्‍त्री पात्र-

            रूपनी (कुसेसरक पत्नी)
रेखा (श्‍यामक पत्नी)

पहि‍ल दृश्‍य-
(कुसेसरक आंगन)
रूपीनी        : कोन लोभमे लटकल छी। गाममे देखै छी जे जेकरो ने कि‍छु छलै ओहो सभ पजेबा घर बना लेलक। कल गड़ा लेलक। नीक-नि‍कुत खाइए। चि‍क्कन-चि‍क्कन कपड़ा पहि‍रैए। अहाँ गाम-गामक रट लगौने छी।

कुसेसर       : कहलौं तँ ठीके मुदा गामक लूरि‍ छोड़ि‍ लूरि‍ कोन अछि‍ जे शहर बजार जा करब। ने गाड़ी चलबैक लूरि‍ अछि‍ आ ने करखानाक काजक। तखन जा कऽ की करब। खर्चा कऽ कऽ जाएब आ बूलि‍-टहैल कऽ चलि‍ आएब। तखन तँ आरो कर्जा लदा जाएत।

रूपनी        : लूरि‍ की कोनो लोक पेटेसँ सीख‍ कऽ अबैए। काज करैत-करैत लूरि‍ होइ छै। सुखदेवाकेँ कोन लूरि‍ छलै। ढहलेल-बकलेल जकाँ गाममे रहै छलै। मति‍ बदललै, ममि‍यौत भाए सेने कलकत्ता गेल।

कुसेसर       : सुनै छी जे आब कलकत्तामे नै रहैए। गाम ऐबो कएल तँ भेँटे ने भेल।
रूपनी        : अहाँकेँ ने नै भेँट भेल। हम तँ भेँट केलि‍ऐ। अंगनामे कुरसीपर चाह पीबैत रहए। जखने देखलक की कुरसि‍येपर चाहक कप रखि‍ आबि‍ कऽ दुनू हाथे पकड़ि‍ दोसर कुरसीपर बैसैले कहलक।
कुसेसर       : (मुस्‍की दैत) तब तँ अहाँ बड़का लोक भऽ गेलौं?

रूपनी        : से की कुरसीपर बैसलौं। ओसारपर शतरंजी ओछाएल रहै ओइपर बैसलौं। मुदा धैनवाद ओकरा दुनू परानीक वि‍चारकेँ दिऐ। अपने लगमे बैस चाहो-पीबै आ रूदपुरवालीकेँ चाह-बि‍‍स्‍कुट नेने अबैले कहलक।

कुसेसर       :  की सभ गप भेल?

रूपनी        : कोनो की एक्केटा गप भेल। अपने खि‍स्‍सा सभ कहए लगल।
कुसेसर       : अखैन कते कमाइए?

रूपनी        : तेकर ठेकान छै। कहलक जे मालि‍क तते बि‍‍सवास करैए। करखानाक मनेजरी दऽ देने अछि‍। ओइठीनक एक रूपैया अपना सबहक सत्तरि‍ रूपैया होइ छै। मि‍हनतो करैए तँ सुखो होइ छै। अपना सभ जकाँ थोड़े अछि‍ जे पेट साधि‍ खटू आ सुखक बेरमे टुटरुमटुम।
कुसेसर       : की करबै। ओकरा भागमे वएह लि‍खल छै अपना सबहक भागमे यएह लि‍खल अछि‍।
रूपनी        : केकरो भाग-तकदीरमे कि‍छु लि‍खल रहै छै। जँ से रहि‍तै तँ धन ठेरी रहै छै आ बेटा हेबे ने करै छै। जँ लि‍खल रहि‍तै तँ सभ कुछ ओकरे होइतै।

कुसेसर       : तब की करब?

रूपनी        : इंजीनि‍यर (श्‍याम) सहाएबकेँ समाद दऽ दि‍अनु जे हम खेत-तेत नै करब। हुनकर ि‍क कोनो खेत दहा जाइ छन्‍हि‍‍‍ आकि‍ रौदीमे जरि‍ जाइ छन्‍हि‍‍‍। जजात जरैए आ दहाइए बटेदारक। ऋृण पैंच लऽ कऽ खेती करू आ उपजाक कोन बात जे लगतो चलि‍ जाइए।
कुसेसर       : कहलौं तँ ठीके मुदा......।
रूपनी        : मुदा-तुदा कि‍छो ने। नै समाद पठेबनि‍ तँ नै पठबि‍अनु। मुदा खेतक आड़ि‍पर जाएब छोड़ि‍ दि‍यौ। जोत-कोड़ छोड़ि‍ दि‍यौ। जखैन गाम औता आ पुछता तँ कहि‍ देबनि‍।

कुसेसर       : आशा तँ वएह खेत अछि‍?

रूपनी        : की अछि‍? ओते महगक खाद कीनै छी, बीआ कीनै छी, खटै छी। तैपर अाधा बॉटि‍ दैत छि‍यनि‍‍। की लाभ होइए। दूध महक डारही होइए। खटनी कम लगै छै। ओते जे बोइनपर खटब तँ ओइसँ बेसी हएत।

कुसेसर       : एकठाम दस सेर भऽ जाइए। बोइनो करब से सभ दि‍न काजो थोड़े लगैए?

रूपनी        : अपनो काज ठाढ़ कऽ लेब। जइ दि‍न बोइन नै लागत तै दि‍न अपने काज करब।

कुसेसर       : से कना हएत। जँ माले पोसब तँ सभ दि‍न ने ओकरा चरबए-बझबए पड़त। घास-भूसा करए पड़त। जइ दि‍न काज करए जाएब तै दि‍न अपन काज कना चलत।
रूपनी        : तँ की गोला-बड़दक सेबनेसँ, जीब‍‍?
           
            (मुनेसरक प्रवेश)
मुनेसर        : कुसेसर, हौ कुसेसर।
कुसेसर       : हँ, हँ भैया, अबै छी।
मुनेसर        : सोहराइवाली कि‍अए रँगल छथुन्‍ह?

            (कुसेसर छुप्‍पे रहैत)
रूपनी        : भैया, हम की कोनो अधला बात बजै छी?
कुसेसर       : हँ भैया, अपनो मोन कखनो-कखनो मानि‍ लइए।
मुनेसर        : से की?

कुसेसर       : सोहराइये वालीक सुइत (हँसुली) बन्‍हकी लगा कऽ खेती केने छलौं। देखते छहक जे अपना बड़दो नै अछि‍। हरो जनेपर लइ छी। तैपर सँ खटवो करै छी आ पूँजि‍यो लगैए। रौदी भऽ गेल। एक्को कनमाक आशा रहल।
रूपनी        : (तरंगि‍ कऽ) हि‍नका जे कहबनि‍ भैया से की हि‍नका नै होइ छन्‍हि‍‍‍। जेहने बटेदार हम तेहने तँ इहो छथि‍।
मुनेसर        : कहलौं तँ एक-लाखक बात मुदा की उपाए?

रूपनी        : छै उपाए भैया?

मुनेसर        : की?

रूपनी        : इंजीनि‍यर सहाएबक खेत छि‍यनि‍। दहाउ की रौदि‍आउ हुनकर खेत थोड़े चलि‍ जेतनि‍। मुदा हमरा सबहक तँ लगता चलि‍ जाइए।
मुनेसर        : कनि‍याँ, दू सेरक अशो तँ अछि‍।
रूपनी        : एहेन आशाकेँ मुँह मारौथ। अना जे चुपेचाप खेत छोड़ि‍ देथि‍न तँ दोखी हेता। हुनका गाम बजा कऽ सभ बात कहबनि‍। कहाँदन बड़का हाकि‍म छथीन। बुझता तँ बड़बढ़ि‍या नै तँ हम सभ बि‍ना पूँजि‍ये काहि‍ काटब ओ अछैते पूँजि‍ये काहि‍ कटताह।
मुनेसर        : कुसेसर, कनि‍याँक वि‍चार हमरो जँचैए। दुनू गोटे बुथपर चल। मि‍लि‍ये कऽ कहबनि‍।

(())

दोसर दृश्‍य-
(श्‍याम इंजीनि‍यरक डेरा)

श्‍याम         : (चाह पीबैत) कल्हुके टि‍कट अछि‍। दस बजे गाड़ी अछि‍। तँए सभ कुछ सम्हारि‍ लीअ।
रेखा         : (तमसाइत) की सम्‍हारब आ की नै सम्‍हारब। हजारो दि‍न कहलौं जे गामक खेत बेचि‍ ि‍लअ, तँ जी गारल अछि‍।
श्‍याम         : कोनो की खगैए जे बेचि‍ कऽ गुजर करब। बाप-पुरखाक अरजल छि‍यनि‍‍, जाधरि‍ रहतनि‍ ताधरि‍ ने लोक नाम लेतनि‍ जे फल्‍लांक छि‍यनि‍‍। ततवे नै अपन लगि‍ते की अछि‍ मुदा साल भरि‍क बुतात (चाउर-दालि‍) तँ चलि‍ते अछि‍।
रेखा         : भरि‍ दि‍न तँ हि‍साबे जोड़ै छी कने जोड़ि‍ कऽ देखलि‍ऐ जे कते पूँजीसँ कते आमदनी होइए।
श्‍याम         : सभठाम हि‍साबे जोड़ने थोड़े काज होइए। इलाकाक-इलाकामे रौदी भऽ जाइ छै, दहार भऽ जाइ छै। अरबो-खरबोक पूँजीसँ एक्को-पाइ आमदनी नै‍‍ होइ छै, से लोक बरदास करि‍ते छथि‍ आ हम......।
रेखा         : जि‍नका दोसर रास्‍ता नै‍‍ छन्‍हि‍ ओकि‍ करताह। मुदा अपना तँ अछि‍।
श्‍याम         : मि‍थि‍लाकेँ दि‍नयाँ देवलोक बुझैए। तइठाम हम छोड़ि‍ कऽ पड़ा जाउँ।

रेखा         : हमर बात कहि‍या सुनलौं जे आइ सुनब।
श्‍याम         : कहि‍या नै‍‍ सुनलौं?

रेखा         : कहि‍या सुनलौं?

श्‍याम         : जँ नै‍‍ सुनलौं तँ आन दि‍न कहाँ कहि‍यो ई बात कहलौं।
            (सुकान्‍तक प्रवेश)
सुकान्‍त       : भजार छी यौ?

श्‍याम         : हँ, हँ भजार, आउ-आउ। बहुत दि‍न अहाँ जीब‍‍?
सुकान्‍त       : वि‍चारे कऽ रहल छलौं जे अहाँसँ भेँट करी। काल्हि‍ गाम जाएब।

सुकान्‍त       : कि‍अए?

श्‍याम         : बटेदार सभ अबैले कहलक अछि‍।

रेखा         : कहै छि‍यनि‍‍ जे कोन लपौड़ीमे पड़ल छी। गामक सभ खेत बेचि‍ कऽ अहीठाम मकान बना लि‍अ। पूँजी ने पूँजी बनबैत अछि‍। जते सम्‍पति‍ गाममे अछि‍ ओ जँ ऐठाम आनि‍ चलाएब तँ ओहि‍सँ कते बर आमदनी हएत।
           
            (रेखाक बात सुि‍न सुकान्‍त मुड़ी डोलबैत। मुदा कि‍छु बजैत नै‍‍।)
श्‍याम         : भजार, गुम्‍म कि‍अए छी?

सुकान्‍त       : ई प्रश्न अपनो संग उठल अछि‍। मुदा.....?

श्‍याम         : मुदा की?

सुकान्‍त       : जे बात कहि‍ रहल छथि‍ ओ अपनो छल। मुदा रूकि‍ गेलौं।

श्‍याम         : रूकि‍ कि‍अए गेलौं?

सुकान्‍त       : ठीके कहब छैक जे जते लोक तते वि‍चार। मुदा नीक अधलाक वि‍चार तँ करै पड़त।

श्‍याम         : समाजक पढ़ल-लि‍खल (वुद्धि‍जीवी वर्ग) लोक तँ अपने सभ छी, अगर अपने सभ आँखि‍ मूनि‍ काज करब तँ जे कम पढ़ल-लि‍खल वा नै‍‍ पढ़ल अछि‍ ओ की करत? तँए ने अहाँसँ पुछैक प्रयोजन।
सुकान्‍त       : की करब अहाँ से तँ हमरा कहने नै करब। मुदा अपन कएल काज कहै छी।
श्‍याम         : हँ, सएह कहू।
सुकान्‍त       : पत्नी लग बजलौं जे गामक खेत बेचि‍ एतै आनि‍ खेत कीनि‍ घर बना भाड़ापर लगा देब। कोनो कारोबार जे करए जाहब से तँ नै भऽ सकैए। नोकरि‍योक ड्यूटी एहेन अछि‍ जे चूर-चूर भऽ जाइ छी।
श्‍याम         : की केलौं?

सुकान्‍त       : पत्नी कहलनि‍ जे खेत-पथार अहाँक कीनल तँ नै‍‍ छी तखन बेचब कि‍अए। स्‍त्रीगणक सोभाब हम बुझै छी। अखैन भलहि‍ं बेचि‍ कऽ लऽ आनू मुदा जे स्‍त्रीगणक गाममे अाब औती ओ की बजती?

रेखा         : की बाजत? केकरो बजने की हेतै?

श्‍याम         : की बजती?

सुकान्‍त       : अपने नै बुझै छलौं मदुा पत्नी कहलनि‍ जे कि‍छुए दि‍नक पछाति‍ घराड़ी घराड़ि‍ये रहत से बात नै‍‍। बाड़ी-चौमास भऽ जाएत। जे कीनत ओ भट्टा उपजाओत की‍ परती बनाएत तेकर कोनो ठीक छै।

श्‍याम         : हँ, से तँ नहि‍ये छै।
सुकान्‍त       : केकरो कि‍यो मुँहमे ताला लगौत। बाजत जे कुकर्मीक घराड़ी छि‍ऐ तँए नढ़ि‍यो भुकै छै वा भट्टा उपजाओल जाइ छै।

श्‍याम         : (नमहर साँस छोड़ैत) फेर की केलि‍ऐ?

सुकान्‍त       : मोन औना गेल। पुछलियनि‍ तँ कहलनि‍ जे पनरहो बीघा जमीन गौआँक बीत दए दि‍अनु। ओ सभ अदलि‍-बदलि‍ एकठाम कऽ हाइ स्‍कूल बना लेता। अहाँ तँ नोकरी करि‍ते छी। जाधरि‍ जीब‍ ताधरि‍ भार तँ सरकार नेनहि‍ अछि‍।
श्‍याम         : अहाँक काज हमरो जँचैए।
रेखा         : कौआसँ खैर लुटाएब कोन कबि‍लती भेल?

सुकान्‍त       : एक्के काजकेँ लोक, अपन-अपन वि‍चारे कते रंगक बुझैए। अपन कएल काज कहलौं। अहाँकेँ मीठ लगए वा तीत ई तँ अहाँक जि‍ह्वा कहत।

रेखा         : जि‍ह्वा तँ सबहक एक्के रंग होइ छै?

सुकान्‍त       : देखैमे भलहि‍ं एक रंग होइ मुदा सुआद फुट-फुट होइ छै। जँ से नै होइतै तँ सभकेँ सभ चीज एक्के रंग लगि‍तै।

(())

 तेसर दृश्‍य-

            (गाम। कुसेसर, मुनेसर, फुलेदेब, श्‍याम आ तीन-चारि‍टा आरो बटेदार)
फुलदेव        : श्‍याम भाय, गाममे हमरा सभकेँ जीब‍‍ कठि‍न भऽ गेल अछि‍। हरीयरी अहाँ सभकेँ अछि‍।
श्‍याम         : नोकरीमे की कोनो लज्‍जति‍ रहल। समए छल जखैन लोक हकि‍मानी करैत छल आ अपना जकाँ खाइत छल। आब तँ नि‍च्‍चाँ-ऊपर मालि‍के-मालि‍क।
फुलदेव        : (हँसैत) एहेन उटपटाँग बात ि‍कअए कहलौं?

श्‍याम         : ि‍सर्फ दरमाहापर आश्रि‍त छी। ओना दरमेहे तते अछि‍ जे नै‍‍ कि‍छु बूझि‍ पड़ैए। लोन लऽ कऽ घर बनेलौं।
फुलदेव        : कते लोन अछि‍?

श्‍याम         : पछि‍ला मास सठि‍ गेल। ऐल-फैल घर अछि‍ चारि‍टा कोठरी भड़ो लगौने छी। जइसँ परि‍वारक खर्च नि‍कलि‍ जाइए।
फुलदेव        : तब तँ दरमाहा बँचबे करत।
श्‍याम         : हँ।
फुलदेव        : भगवान करथि‍ कतौ रही चैनसँ रही।
श्‍याम         : बच्‍चा सभकेँ पढ़बैमे बड़ खर्च होइए।
फुलदेव        : खर्च करै छी की अपन भार उतारै छी। आब गप आगू बढ़ाउ, कुसेसर।
कुसेसर       : फुलदेव भाय, अहूँ कि‍सान छी। दस बीघा खेत जोतै छी। खेतीक सभ भाँज बुझै छी। कते लगता खेतीमे लगै छै से अहाँसँ छि‍पल अछि‍।
फुलदेव        : झाँपि‍-तोपि‍ कऽ नै बाजू। खोलि‍ कऽ साफ-साफ बाजू।
मुनेसर        : फुलदेव बौआ, कुसेसर बजैमे धकाइए। हम कहै छी। इंजीनि‍यर सहाएब पाँचटा बटेदार छी। अखैन धरि‍ अाधा-अधी उपजा बँटैत एलि‍यनि‍। मुदा बेर-बेर रौदी दाही होइए। हि‍नकर (श्‍यामक) तँ कि‍छु नै‍‍। बि‍गड़ैत छन्‍हि‍‍‍। उपजा नै होइ छन्‍हि‍‍‍। खेत तँ बँचले रहै छन्‍हि‍‍‍। मुदा हमरा सबहक तँ सभ कुछ चलि‍ जाइए।
श्‍याम         : अहाँ सभ अाधा बाँटि‍ कऽ की हमरेटा दइ छी। आकि‍ सभकेँ-सभ दैत छै। जे अदौसँ अछि‍।
फुलदेव        : जे समए बीत‍ गेल ओ तँ बीत‍ गेल। पुन: घुरत नै‍। मुदा आँखि‍यो मुनि‍ कऽ जीब‍‍ उचि‍त नै‍‍।
मुनेसर        : ओते चि‍क्कारीमे गप करबाक कोन जरूरी अछि‍। सोझ-साझ बात सुनू। सभ दि‍नसँ बटाइ करैत एलौं। जे नीक की अधला भेल, भेल। बि‍ना कहने छोड़ि‍ दैत‍यनि‍ से नीक नै होइत तँए सोझामे कहै छि‍यनि‍ जे हम सभ बटाइ नै करब।

फुलदेव        : एना औगुता कऽ कि‍अए बजै छी। केना रोग दवाइ केने छुटैए। हँ, समाजमे ई रोग भारी अछि‍। भने सभ बैसले छी कि‍अए ने वि‍चारि‍ कऽ रास्‍ता नि‍कालि‍ लेब। गामक जमीन गामेक लोक उपजाओत।
श्‍याम         : फुलदेव, पत्नीक वि‍चार छन्‍हि‍‍ जे बेचि‍ लि‍अ। मुदा एकटा दोस्‍त छथि‍ ओ कहलनि‍ जे अपन जमीन समाजकेँ सुमझा देलि‍यनि‍। बातो सत्‍य जे जे गाममे रहता गाम हुनकर छि‍यनि‍। तँए खेतीक बात बुझै नै‍‍ छी अहाँ सभ उि‍चत रास्‍ता नि‍कालि‍ कहू, मानि‍ लेब।
फुलदेव        : कते गोटे स्‍कूल बनबैत छथि‍, कते गोटे अस्‍पताल। समाजमे एकरो जरूरति‍ अछि‍। मुदा सभसँ प्रमुख जरूरी अछि‍ जे गामक सम्‍पति‍ (जमीन) केँ समुचि‍त उपाए कए उपजा बढ़ाओल जाए।
श्‍याम         : उपजा केना बढ़त?

फुलदेव        : बारह मासक सालमे ि‍सर्फ वर्षे मौसम एहेन अछि‍ जे सालो भरि‍केँ प्रभावि‍त करैत अछि‍। खूब बरखा भेल दहार भेल। नै बरखा भेल रौदी भेल। सालो भरि‍ खेति‍हर त्राहि‍-कृष्‍ण करैत रहह।
मुनेसर        : फुलदेव बौआ, अहाँ देखते छी जे दूटा हाथ-पएर छोड़ि‍ कि‍छु अछि‍ नै। तँए की हमसब ऐ गामक नै कहाएब से बात तँ नै अछि‍। इंजीनियर सहाएब, सभ तरहेँ सम्‍पन्न छथि‍ मुदा छि‍आह तँ अही गामक। तँए......।
श्‍याम         : तँए कि‍?

फुलदेव        : श्‍यामबाबू, अहाँ ि‍सर्फ माटि‍ बटेदारकेँ देने छि‍ऐ। मुदा माि‍टसँ उपजा केना हएत? ऐ बातपर वि‍चार करए पड़त।
श्‍याम         : जहाँ धरि‍ संभव हएत, करैले तैयार छी।
फुलदेव        : बीस बीघा जमीन अछि‍। दूटा बोंरि‍ग आ एकटा दमकल कीनि‍ बटेदारकेँ दए दि‍यौ। जखैन पानि‍ हाथमे आबि‍ जाएत तखन बाढ़ि‍-रौदीक संकट कमि‍ जाएत। आठ मासक बि‍‍सवासू खेती आ चारि‍ मास अाधा भऽ जाएत। दहार नै‍‍ रोकि‍ सकब तँ रौदीसँ बचाओल जा सकैत अछि‍।
श्‍याम         : बड़बढ़ि‍याँ।
बटेदार        : एतबेटा सँ नै‍‍ हएत। मोटा-मोटी यएह बुझू जे अहाँ सबहक (बटेदार सबहक) शरीर आ इंजीनियर सहाएबक पूँजी रहतनि‍। तँए आरो कि‍छु पूँजी लगबैक जरूरति‍ छन्‍हि‍‍‍।

श्‍याम         : से की?

फुलदेव        : खेत जोतैले बड़द, नीक बीआ आ खादक ओरि‍यान सेहो कऽ दि‍यौ।
श्‍याम         : बड़बढ़ि‍याँ। मुदा हमरा आपसी की हएत?

फुलदेव        : खेतसँ लऽ कऽ दमकल-बोरि‍ंग, बरद, खाद-बीआ लगा सभ पूँजी भेल। बैंकक जे सूद छै ओकरा धि‍यानमे राखि‍ आपसी हएत।
मुनेसर        : की इंजीनियर सहाएब, मंजूर अछि‍?

श्‍याम         : अहाँ सभ कहू।
कुसेसर       : ए-मस्‍त।
फुलेसर       : जँ स्‍वीकार भेल तँ सभ थोपड़ी बजा....।
            (सभ थोपड़ी बजा ि‍नर्णएकेँ स्‍वीकार केलनि‍।)
(())समाप्‍त(())

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